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Showing posts from May 15, 2012

गांधी जी का हिन्दुत्व और अस्पृश्यता

गांधी जी ‘हिन्दुत्व’ के बहुत बड़े आग्रही थे। हिन्दुत्व के प्रति उनकी श्रद्धा इतनी गहरी थी कि वे इसे अपने जीवन की अत्यंत अमूल्य निधि मानते थे। उनका मानना था -
‘‘मुझे अपने सनातनी हिन्दू होने पर गर्व है। यद्यपि मैं हिन्दू धर्मग्रन्थों का आचार्य नहीं हँू, मैं संस्कृत का विद्वान भी नहीं हूँ, लेकिन मैंने वेदों और उपनिषदों के अनुवाद पढ़े है। स्पष्ट है कि मैंने इनका गहन तथा विस्तृत अध्ययन नहीं किया है, लेकिन फिर भी मेरी हिन्दुत्व के प्रति दृढ़ आस्था है।’’1
गांधी जी इस बात से अत्यंत व्यथित थे कि हिन्दू धर्म में अनेक अच्छे विचार होने के बावजूद अस्पृश्यता की विषबेल इस विराट वृक्ष की जड़ों को लगातार खोखला कर रही है। उनका मत था कि यदि हम इस शाप को अपने चिन्तन से नहीं मिटाएंगे तो यह हिन्दुत्व को विनाश के पथ पर ले जा सकता है। वे अस्पृश्यता को हिन्दुत्व के माथे पर बहुत बड़ा कलंक मानते थे। इस सन्दर्भ में उनके बाल्यकाल का एक प्रसंग उद्धृत है -
गांधी जी जब बारह वर्ष के थे, तब उनके जीवन में एक घटना घटी। अक्का नामक एक अस्पृश्य उनके घर शौचालय साफ करने आया करता था। घर के लोग उनसे उस अस्पृश्य को न छूने की बात …

समकालीन शिक्षा पर एक नज़र

शिक्षा किसी भी समाज के सर्वांगीण विकास का सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपागम होती है। वस्तुतः किसी भी वर्ग, समुदाय, समाज अथवा राष्ट्र के विकास की सबसे पहली सीढ़ी शिक्षा ही होती है। प्रत्येक समाज की संरचना स्त्री तथा पुरूषों के सामूहिक दायित्वों पर आधारित होती है, किन्तु जब हम शिक्षा एवं स्त्री के अन्तर्सम्बन्धों पर दृष्टिपात करते हैं, तो सामूहिक दायित्व के समान अधिकारों के परिप्रेक्ष्य में स्त्री सबसे निचले पायदान पर खड़ी दिखाई देती है। यदि आज महिलाएँ, दमित, शोषित एवं वंचित दिखाई देती हैं, तो इसका सबसे बड़ा कारण स्त्रियों की शिक्षा के प्रति समाज की उदासीनता है। यद्यपि सन 1950 में भारत में स्त्री साक्षरता की दर मात्र 18.33 प्रतिशत थी, जो सन 2011 में बढ़कर 50 फीसदी से अधिक हो गई है लेकिन यह आंकड़ा भी हमें उत्साहित नहीं करता क्योंकि अभी भी यह दर पुरूषों की तुलना में काफी कम है।
सरकार ने स्त्री शिक्षा को प्रोत्साहित करने के लिए अनेक कार्यक्रम तथा योजनाएँ चलाई हैं, परन्तु फिर भी अपेक्षित विकास एवं सफलता हासिल नहीं हो सकी है। आज भी देश की अनेक बालिकाएँ ऐसी हैं, जो अपने पूरे जीवनकाल में स्कूल का मुँह …

स्त्री का वैदिक पक्ष

वैदिक काल में स्त्री विमर्ष
समकालीन साहित्य मेें महिला विमर्श एक अत्यन्त लोकप्रिय साहित्य कर्म है। वर्तमान समय में महिला-विमर्श पर वार्ता करना साहित्य की सर्वप्रमुख विशेषता बन गयी है, परन्तु हम इसकी जड़ें चिर प्राचीन काल से भारतीय दर्शन में पाते हैं। भारतीय संस्कृति एवं दर्शन सदैव ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता’ सिद्धान्त का अुनगामी है। भारत में सर्वदा नारी को अत्यन्त उच्च स्थान पर प्रतिष्टित किया गया तथा उसे लक्ष्मी, देवी, साम्राज्ञी, महिषी आदि सम्मानसूचक नामों से अभिहित किया जाता था। वेदकाल में नारी को एक रत्न की संज्ञा दी जाती थी। अथर्व वेद में नारी के सम्मान को वर्णित करने वाला एक श्लोक दृष्ट्रव्य है-
अनुव्रतः पितुः पुत्रो माता भवतु सम्मनाः।
जाया परये मतुमतीं वाचं यददु शान्तिवाम्।।1
वैदिक काल में ‘परिवार’ नामक संस्था अत्यधिक विकसित एवं पल्लवित थी। इस काल में आर्यजन परिवार के रूप में एक इकाई बनकर रहा करते थे । उस समय सम्मिलित कुटुम्ब प्रथा थी। ऋग्वेद में विवाह के दौरान पुरोहित वर-वधू को यह आशीर्वाद दिया करते थे कि तुम लोग यहीं निवास करो, वियुक्त मत होओ, अपने घर में पुत…