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Showing posts from 2015

ये तो हमारी संस्कृति नहीं !!!!

इस देश में शास्त्रार्थ की अत्यंत स्वस्थ परम्परा रही है। विभिन्न सम्प्रदायों के बीच स्वस्थ बहस से भारतीय मनीषा ने अपने ज्ञान को विस्तृत किया है। परस्पर विरोधी अवधारणाएं एक ही समय में न सिर्फ रहीं बल्कि उन्होंने एक दूसरे को प्रभावित करने का काम भी किया। दक्षिण की द्रविड़ संस्कृति की  आराधना पद्धति आर्य परम्परा में ऐसी घुल मिल गयी कि कोई यह कह ही नहीं सकता कि यह पद्धति हमारे क्षेत्र की नहीं है। क्या आज कोई विश्वास के साथ बता सकता है कि हममें से आर्य, शक, हूण, यक्ष, नाग, कोल, किरात जाति का कौन है। ये सब हममें घुलमिल गईं। हमने वेद को स्वीकारा तो उसकी प्रतिक्रिया स्वरूप रचे उपनिषद को भी स्वीकारा। तुलसी हमारे हैं तो कबीर भी हमारे हैं, सूफी भी हमारे अपने हैं। हिन्दू, बौद्ध, जैन, सिक्ख, मुसलमान, यहूदी, पारसी, ईसाई सबको हमने उनके आराधना पद्धति और धर्म के साथ अपनाया लेकिन अंग्रेजों के आने के बाद से हमारी सहिष्णुता में कमी आयी, जिसके परिणामस्वरूप देश के कई टुकड़े हुए और बर्मा, अफगानिस्तान, भूटान, नेपाल तथा तिब्बत को चुपचाप हमसे अलग करने के बाद जाते-जाते वे पाकिस्तान बनाकर कभी न भरने वाला ज़ख्म ह…

कलिकथा वाया बाइपास के बहाने समाज की पड़ताल

यह लेख अलका सरावगी के उपन्यास कलि कथा वाया बायपास उपन्यास की संकरी कलकतिया गलियों से गुजरकर भारतीय समाज के परिवर्तनों की आहट को महसूसता है.

जिस दौर में ‘कलि कथा वाया बाइपास’ लिखा गया, वह दौर भूमंडलीकरण की आहट के कोलाहल में डूबा हुआ था. उस दौर में हर बुद्धिजीवी अपने-अपने ढंग से इसको परिभाषित कर रहा था और इसके सामाजिक प्रभावों की पड़ताल कर रहा था. यह उपन्यास भी भूमंडलीकृत समाज में सामाजिक व्यवस्था से अजनबीपन की हद तक कटे हुए किशोर बाबू की कहानी है, जिनके दिल की बाइपास सर्जरी क्या हुई, उनका चीज़ों को देखने का नजरिया ही बदल गया. जो किशोर बाबू मध्यमवर्गीय मानसिकता के अनुरूप अनेक प्रकरणों को बाइपास कर जाने की मानसिकता रखते थे, दिल की सर्जरी के बाद बार-बार उन गलियों में चले जाते हैं, जिनसे वे कभी गुजरकर आये थे. उनकी यह यात्रा उन्हें अपने पुरखों के जीवन से 1 जनवरी सन 2000 तक की यात्रा पर ले जाती है, जिसमें प्रसंगानुसार इतिहास की घटनाएं भी चहलकदमी करती रहती हैं.
यह कथा वस्तुतः डेढ़ सौ साल के रूढ़िवादी मारवाड़ी समाज की कथा ही नहीं है, वरन इसमें भारतीय समाज की विसंगतियों की जड़ें देखी जा सकती हैं. उद…

पुरुष भावनाओं की अभिव्यक्ति है यायावर

आजकल साहित्य में स्त्री विमर्श की बड़ी धूम है. स्त्रियों के अधिकारों, उनकी व्यथाओं एवं पीड़ा के आख्यानों की चर्चा से साहित्य गुंजायमान है. परन्तु पुरुष की भावनाएँ, उसकी अपेक्षाएँ तथा ज़रूरतें साहित्य से प्रायः बहिष्कृत हैं. इसका कारण यह दिया जाता है कि सदियों से पुरुष ने स्त्रियों पर अत्याचार किए हैं और स्त्री ने उन अत्याचारों को मौन होकर सहा है, इसलिए स्त्री की पीड़ा का बखान ज़रूरी है. यह बात सच भी है लेकिन क्या इसी आधार पर पुरुष की वेदना के आख्यानों को साहित्य से देशनिकाला दे दिया जाना चाहिए और उसकी आवाज़ का गला घोंट दिया जाना चाहिए? मेरे विचार से ऐसा करना समस्या को एकांगी दृष्टिकोण से देखना होगा.       हिन्दी साहित्य में बहुत कम ऐसे लेखक हैं, जिन्होंने पुरुषों की पीड़ा पर अपनी कलम चलाई है. आचार्य निशांतकेतु के बाद यदि किसी लेखक का नाम जेहन में आता है तो वह हैं चन्द्र विजय प्रसाद ‘चन्दन’ जी. चन्दन जी इससे पहले ‘लौट आओ सिम्मी’ उपन्यास के माध्यम से एक किशोर प्रेमी की कोमल अनुभूतियों एवं निश्छल प्रेम की अभिव्यक्ति कर चुके हैं. समीक्ष्य ‘यायावर’ लघु उपन्यास के माध्यम से उन्होंने एक भोले-भाले व…

भारत के भाषाई राजदूत

भारत के भाषाई राजदूत  डॉ पुनीत बिसारिया*
यह लेख भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद की पत्रिका गगनांचल के विश्व हिन्दी सम्मेलन विशेषांक में प्रकाशित हुआ है, जिसका विमोचन 10 सितम्बर 2015 को दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन का भोपाल में उद्घाटन करते हुए प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने किया.

आपको याद होगा कि जब राज कपूर की फिल्म आवारा आयी थी, तो उस समय उसके एक गीत ‘आवारा हूँ’ से भारत की पहचान जुड़ गयी थी. इस गीत की लोकप्रियता का यह आलम था कि उस दौरान राज कपूर जिस देश में भी जाते थे, उस देश में वहां की जनता उनका स्वागत ‘आवारा हूँ’ कहकर ही किया करती थी.वैश्विक धरातल पर विदेशियों के बीच उन्माद के स्तर पर हिन्दी की लोकप्रियता का यह सबसे पहला बड़ा प्रमाण है. इसके बाद हिन्दी का दिग्विजयी रथ रुका नहीं और वह आगे सरपट दौड़ता गया जिसका परिणाम सम्पूर्ण विश्व में हिन्दी के प्रति प्रेमभाव के रूप में आज हमारे समक्ष है. हिन्दी की लोकप्रियता और सहज स्वीकारोक्ति की एक बड़ी वजह यह भी रही कि इसने लिपि, शुद्धता या क्लिष्टता के बंधन को कभी स्वीकार नहीं किया और अन्य भाषाओँ के शब्दों को भी स्नेह से गले लगाकर अपना बना लिया. जिस भ…

कौन कहे? यह प्रेम हृदय की बहुत बड़ी उलझन है

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“‘उर्वशी’ पढ़ते-पढ़ते जब मैंने यह पंक्ति पढ़ी कि ‘उर्वशी अपने समय का सूर्य हूँ मैं’ तब एकदम ऐसा लगा कि दिनकर ने पुरुरवा के मुख से जो यह पंक्ति कहलाई है, वह पुरुरवा पर चाहे लागू होती हो या न होती हो, दिनकर पर लागू होती है.और ‘समय’ का अर्थ यहाँ अखिल समय मानना चाहिए. दिनकर अपने देश के ही नहीं, अपने समय के सूर्य कवि थे. यह तो हमारा दुर्भाग्य है कि हमारी भाषा एक अभिशप्त भाषा है. इसमें लिखने वाला अंतरराष्ट्रीय कदाचित ही हो पायेगा........हिन्दी का हर पाठक अपने मन में जानता है कि अगर दिनकर ठीक अनुवादित होकर देश-विदेश में पेश किये जाते तो पिछले पचास साल में उत्पन्न किसी भी विश्व कवि कहे जाने वाले कवि के मुकाबले में ऐसे छोटे तो न पड़ते.”1