श्रीकांत वर्मा की पुण्यतिथि पर

नई कविता आन्दोलन के प्रमुख हस्ताक्षर श्रीकांत वर्मा की आज 19 वीं पुण्यतिथि है. श्रीकांत वर्मा की कविताएँ साहित्य में लघु मानव की प्रतिष्ठा के साथ-साथ ऐतिहासिक पात्रों के नवीन परिवेश में अंकन का जीवंत दस्तावेज हैं. 18 नवम्बर सन 1931 को बिलासपुर में जन्मे वर्मा जी दिनमान समेत अनेक साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादक रहे. आपने कांग्रेस पार्टी में रहकर कई वर्षों 1967 से 1986 तक राजनीति में भी हाथ आजमाया. गरीबी हटाओ नारा उन्हीं की कलम से निकला था.
सन 1976 में काँग्रेस से वे राज्य सभा के सदस्य बने। और सत्तरवें दशक के उत्तरार्ध से ८०वें दशक के पूर्वार्ध तक उन्होंने कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता के रूप में कार्य किया। सन 1980 में वे इंदिरा गांधी के राष्ट्रीय चुनाव अभियान के प्रमुख प्रबंधक रहे और 984 में राजीव गांधी के परामर्शदाता तथा राजनीतिक विश्लेषक के रूप में कार्य करते रहे। राजीव गाँधी के शासन काल में उन्हें सन 1985 में महासचिव के पद से हटा दिया गया।
वे पचास के दशक में उभरने वाले नई कविता आंदोलन के प्रमुख कवियों में से थे। उन्हें सन 1973 में मध्यप्रदेश सरकार का 'तुलसी पुरस्कार'; 1980 में 'शिखर सम्मान';1983 में 'आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी' पुरस्कार; 1984 में कविता पर केरल सरकार का 'कुमार आशान' राष्ट्रीय पुरस्कार; 1987 में मगध कविता संग्रह के लिये मरणोपरांत साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान किए गए। उनकी मुख्य रचनाएँ इस प्रकार हैं-
काव्य रचनाएँ - भटका मेघ (1957), मायादर्पण (1967), दिनारंभ (1967), जलसाघर (1973), मगध (1983) और गरुड़ किसने देखा (1986)।
उपन्यास - दूसरी बार (1968)।
कहानी-संग्रह - झाड़ी (1964), संवाद (1969), घर (1981), दूसरे के पैर (1984), अरथी (1988), ठंड (1989), वास (1993) और साथ (1994)।
यात्रा वृत्तांत - अपोलो का रथ (1973)।
संकलन - प्रसंग।
आलोचना - जिरह (1975)।
साक्षात्कार - बीसवीं शताब्दी के अंधेरे में (1982)।
अनुवाद - 'फैसले का दिन' रूसी कवि आंद्रे बेंज्नेसेंस्की की कविता का अनुवाद।
जीवन के अंतिम क्षणों में उन्हें अनेक बीमारियों ने घेर रखा था। अमेरिका में वे कैंसर का इलाज कराने के लिए गए थे, वहीँ पर मात्र 55 वर्ष की अल्पायु में 26 मई, 1986 को न्यूयार्क में उनका निधन हुआ। उन्हें विनम्र स्मरणंजलि
प्रस्तुत है उनकी कविता भद्रवंश के प्रेत
छज्जों और आईनों, ट्रेनों और दूरबीन
कारों और पुस्तकों
यानी सुविधाओं के अद्वितीय चश्मों से
मुझे देखने वाले
अपमानित नगरों में सम्मानित नागरिकों
मुझे ध्यान से देखो
जेबी झिल्लियाँ सब उतार
मुझे नंगी आँखों देखो
पहिचानो।
मैं इस इतिहास के अँधेरे में, एक सड़ी और
फूली लाश सा
घिसटने वाला प्राणी कौन हूँ
ओ विपन्न सदियों के प्रभुजन, सम्पन्न जन।
मुझको पहिचानो
कुबडे, बूढे, कोढी, दैत्य सा तुम्हारे
हॉलो, शेल्फों, ड्रायर या ड्रेसिंग टेबल में
छिपने वाला प्राणी मैं कौन हूँ
पहिचानो, मुझको पहिचानो।
मेरी इस कूबड़ को जरा पास से देखो
मेरी गिलगिली पिलपिली बाँहें अपनें
दास्तानों से परे
अँगुलियों से महसूस करो
शायद तुमने इनको ग्रीवा के गिर्द कभी
पुष्प के धनुष सा भेंटा हो।
मुझसे मत बिचको
मुझे, घृणा की सिकुड़ी आँखों मत देखो
मुझसे मत भागो।
मेरे सिकुड़े टेढे ओठों पर ओठ रखो।
शायद तुमने इनमे कभी
किसी का
पूरा माँसल अस्तित्व कहीं भोगा होगा।
मेरी बह रही लार पर मत घिन लाओ
यह तुम हो
जो मुझसे हो कर गुजरे थे।
मेरी गल रही अंगुलियाँ देखो
पहचानो।
क्या मेरे सारे हस्ताक्षर धुंधला गये?
क्यों तुम मुझसे हरदम कटते हो?
क्यों मैं तुम्हारे सपनों में आ धमकता हूँ?
क्यों मैं तुम्हारे बच्चों को नहीं दिखता?
तुमको ही दिखता हूँ
जाओ
अपने बच्चों से पूछो।
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