किसानों की आत्महत्या

किसानों की आत्महत्या की खबरें सुन पढ़कर अनायास ही प्रेमचन्द की कहानी पूस की रात याद आ गई और इस बात पर गहरा क्षोभ भी हुआ कि इस कहानी को लिखे हुए लगभग अस्सी बरस बीत जाने के बावजूद हलकू की तरह आज का किसान भी या तो मजदूरी को किसानी से बेहतर बता रहा है या फिर मौत को गले लगा रहा है।
इक्कीसवीं सदी के डेढ़ दशक बाद भी क्या किसानी रामभरोसे ही रहेगी ? कोई वैज्ञानिक ऐसी कृत्रिम छत क्यों नहीं ईजाद करता जो किसानों को अनावश्यक अतिवृष्टि से निजात दिला सके। ये ग्राउंड वाटर रिचार्जिंग में भी उपयोगी होगा। किसान को फसल पर शत प्रतिशत बीमा करने की शर्त भारत आने वाली बहुराष्ट्रीय बीमा कम्पनियों के आगे क्यों नहीं रखी जाती। बम्पर फसल होने पर गाँव में ही विकसित कुटीर उद्योगों के द्वारा उनकी फसल बेचने की व्यवस्था क्यों नहीं की जाती? फल, सब्ज़ी, दूध, अनाज आदि के भण्डारण और शीतलन एवम् परिवहन के लिए पीपीपी मॉडल पर काम क्यों नहीं किया जाता और सबसे ज़रूरी बात यह कि किसान की उपज खेत में जाकर ही खरीदने की व्यवस्था और बिचौलियों से मुक्ति की कोई ठोस व्यवस्था क्यों नहीं अमल में लाई जाती? आज के किसान को कर्ज से ज़्यादा ज़रूरी है उसे उसकी उपज का सही दाम मिलना और फसल खराब होने की चिंता से मुक्ति। क्या सरकारें इस दिशा में कभी ध्यान देंगी!

Comments

Popular posts from this blog

हिन्दी सिनेमा में गाँव और लोकजीवन

किन्नर विमर्श : समाज के परित्यक्त वर्ग की व्यथा कथा

कौन कहे? यह प्रेम हृदय की बहुत बड़ी उलझन है