सेक्युलरिज्म और समाजवाद पर बहस

भारतीय संविधान की  प्रस्तावना के अनुसार भारत एक सम्प्रुभतासम्पन्न, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक, गणराज्य है। सन 1976 में तत्कालीन इन्दिरा गाँधी की सरकार ने आपातकाल के बाद आम जनता को लुभाने के लिए समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष या सेक्युलर ये दो शब्द संविधान की प्रस्तावना में जोड़ दिए थे. गणतंत्र दिवस की 65 वीं जयंती पर भारत सरकार ने  26 जनवरी सन 2015 को जो विज्ञापन जारी किया, उसमें से समाजवादी और सेक्युलर शब्द हटा दिए. इस पर हो रहे विवाद के बीच सरकार अब चर्चा चाहती है . मेरा मानना है कि जिन सन्दर्भों में समाजवाद और सेक्युलर की अवधारणा संविधान की प्रस्तावना में जोड़ी गई थी, वे सन्दर्भ ही अब अप्रासंगिक हो गए हैं. अब न तो समाजवाद अपने जनवादी चेहरे के साथ उपस्थित है और न ही सेक्युलर शब्द की सामाजिक राजनैतिक अर्थों में ज़रूरत है. कुछ मुलायमियत से युक्त राहुलपंथी नेता ही अपने स्वार्थों के लिए इन शब्दों की अस्मिता से लगातार खिलवाड़ कर रहे हैं. जिस भारतीय लोकतंत्र में वोट हासिल करने के लिए नेतागण स्वयंभू बाबाओं से लेकर शाही इमामों और हिन्दू-मुस्लिम, सिख धर्मगुरुओं से अपनी पार्टी के पक्ष में फतवे जारी कराने को लेकर उतावले रहते हों, उस देश के संविधान की प्रस्तावना में सजावट के तौर पर सेक्युलर शब्द रखे जाने का कोई औचित्य कम से कम मुझे समझ में नहीं आता. इसी प्रकार समाजवाद का मुलायम संस्करण अब पुत्र-पुत्र वधुओं से होते हुए पौत्रों तक आ पहुंचा है;  भारतीय राजनीति से समाजवाद की सच्ची अवधारणा का जनाजा अब निकल चुका है.ऐसे में इस देश के संविधान को इन दो सजावटी शब्दों की न तो ज़रूरत है और न ही वर्तमान सामाजिक-राजनैतिक ढांचे में इनकी उपयोगिता ही शेष रह गयी है. इसलिए संविधान की प्रस्तावना से इन शब्दों को हटा देना कहीं से गलत नहीं है. कुछ तथाकथित छद्म समाजवादी और सेक्युलर दल शोर करेंगे तो करते रहें, सरकार को इस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए.

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