आदिवासी समाज के इतिहास की दारुण गाथा है ‘आदिवासी अभिव्यक्ति’

भाई रवि कुमार गोंड़ आदिवासी लेखकों में तेज़ी से पहचान बनाने वाला नाम है. इस युवा साहित्यकार ने साहित्य जगत में बीते कुछ वर्षों में अपने निरंतर लेखन से हमारा ध्यान खींचा है. रवि की नवीनतम उपलब्धि है उनकी हाल ही में प्रकाशित लम्बी कविता 'आदिवासी अभिव्यक्ति',जिसकी शुभाशंसा लिखने का सौभाग्य मुझे मिला है. पेश है मेरे द्वारा लिखित शुभाशंसा




आदिवासी समाज के इतिहास की दारुण गाथा है ‘आदिवासी अभिव्यक्ति’
बीते कुछ वर्षों में आदिवासी विमर्श ने समकालीन हिन्दी साहित्य में तेज़ी से अपनी दस्तक दी है. आदिवासी विचारधारा और दर्शन को बढ़ाने में जिन साहित्यकारों का योगदान रहा है, उनमें युवा कवि समीक्षक रविकुमार गोंड का नाम प्रमुखता से लिया जाना चाहिए. रवि ने अत्यल्प आयु में साहित्य जगत के इस अपेक्षाकृत नए विमर्श को अपने गम्भीर चिंतन एवं वैचारिक आयामों से समृद्ध करने का सराहनीय प्रयास किया है. रवि समीक्ष्य लम्बी कविता ‘आदिवासी अभिव्यक्ति’ के माध्यम से हमें आदिवासियों के उस संसार में ले जाते हैं, जहाँ का इतिहास कतिपय निहित स्वार्थों के कारण आज तक उपेक्षित ही रहा और उन्हें इतिहास-पुराण  के सबसे निचले पायदान पर धकेल दिया गया, जहाँ से उनकी चीख भी आम जनता की नजरों से ओझल रही. इक्कीसवीं शती के शैशवकाल में आदिवासियों के बीच से ऐसे कई हस्ताक्षर उभरकर सामने आये, जिनके लगातार साहित्यिक दखल एवं दबाव के कारण तथाकथित मुख्य धारा के साहित्य को आदिवासी साहित्य को भी अपने आंचल में जगह देने को बाध्य होना पड़ा है और आदिवासी जीवन की पौराणिक-ऐतिहासिक गाथाओं-मिथकों को नवीन सन्दर्भों एवं प्रकरणों से अर्थ दीपित कर उन्हें उनका गौरवशाली स्थान देना पड़ा है. मेरे जैसे सवर्ण समाज के भी अनेक लेखक-साहित्यकार भी आदिवासी विमर्श की चिन्तन धारा में अवगाहन करने हेतु सामने आ रहे हैं.
इतना सब होने के बावजूद आदिवासी कविता के क्षेत्र में एक ऐसी लम्बी कविता की कमी काफी समय से महसूस की जा रही थी, जो आदिवासियों के अतीत और वर्तमान की अंतहीन दारुण यात्रा को पाठकों के सामने रख सके. युवा कवि रविकुमार गोंड की यह कविता इसी अभाव की पूर्ति करती है. कविता का प्रारंभ ‘मैं इतिहास हूँ’ से करते हुए कवि स्पष्ट तौर पर घोषित करता है कि मेरे अर्थात आदिवासियों के इतिहास को समझे बिना तथाकथित पारम्परिक इतिहास अधूरा, एकांगी और पक्षपातपूर्ण है. वह रामायण के सन्दर्भों से शुरू होकर महाभारत से होते हुए अंग्रेजों के विरुद्ध आदिवासियों के संघर्ष की चर्चा करते हैं और यह बताने का प्रयास करते हैं कि रामायण के वानर, शबरी, शम्बूक से होते हुए महाभारत के एकलव्य की गुरुभक्ति से आगे बढ़कर तिलका मांझी, सीधू कानू, नंगवाह, सोनी सोरी तक आदिवासी सिर्फ और सिर्फ छले ही गए हैं लेकिन यहाँ यह बताना अपरिहार्य है कि इन सबके बावजूद कवि की आशाएं नकारात्मकता की कुहेलिका में नहीं खोई हैं, बल्कि वह आशावान होकर नए समाज का ऐसा स्वप्न देखता है, जहाँ आदिवासी किसी अजूबे की वस्तु न होकर राष्ट्र की प्रगति का इंजन बनें और वे भी एक आम भारतीय की भांति जीवन-यापन कर सकें. वह चाहता है-
हम भी हैं आदमी, कोई हैवान नहीं
शोषण करें किसी का
ये हमारा काम नहीं.
हम तो सोच रखते हैं
सभी खुशहाल हों,
दीपक जलते रहें घरों में
न कभी अंधकार हो.
न छोटे बड़े का भेद हो,
न भाव हो कुरीति का.
आपस में मिल-जुलकर रहें,
बना रहे मन प्रीति का.
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं समझा जाना चाहिए कि आदिवासी अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों को आँख मूंदकर सहन करते रहेंगे. कवि स्पष्ट कहता है कि अब हम अपने आपको लुटने नहीं देंगे और अपने भाग्य विधाता स्वयं बनेंगे. कवि की यह सोच है कि हमारा शासन शीघ्र ही आयेगा-
समर भूमि में कूद पड़े जब
अब पाँव न पीछे हटाएँगे.
अब किसी के सामने हमको,
झुकना हरगिज मंजूर नहीं
होगा हमारा शासन एक दिन,
अब वह दिन ज्यादा दूर नहीं.
कवि आदिवासियों के प्रति निर्मम व्यवहार के भाव से तंग आकर खीजकर कह उठता है-
हर चेहरे पर मुझे कई चेहरे नजर आते हैं
नफरतों में बंट गई ये दुनिया
हर चेहरे के पीछे दो चेहरे नज़र आते हैं.
खून की होली खेलते हैं
जब लोग अपनों के खून से
तब मुझे मातम-ए- मंजर नज़र आते हैं. 
वह सवाल करता है और खुद ही जवाब देता है-
आदिवासी तुम्हारी नज़रों में
बर्बर ही क्यों दीखते?
वह शायद इस कारण से हैं दीखते
क्योंकि वह अपना इतिहास नहीं हैं लिखते.
अगर उसने आज अपना इतिहास लिखा होता
वह सुखपूर्वक
तुम्हारी तरह जिया होता.
अगर साहित्य के प्रचलित पैमानों और भाषा, शैली, अलंकार की प्रचलित परिपाटी पर इस कविता को परखने का प्रयास किया जाएगा तो आलोचकों को निराशा हो सकती है लेकिन खरा- खरा बोलने का साहस, असहमतियों के बावजूद धैर्य न खोने का विवेक तथा निराशा और आशा की बारीक धार पर चलने का नटकौशल देखना हो तो इससे बेहतर कविता नहीं हो सकती. मैं युवा कवि की इस महत्त्वपूर्ण देन पर उन्हें बधाई देता हूँ और अपेक्षा करता हूँ कि भविष्य में भी उनसे आदिवासी साहित्य का कोष समृद्ध होता रहेगा.


डॉ. पुनीत बिसारिया   
(युवा समीक्षक)
‘साहित्य-संस्कृति’
8- राधा एनक्लेव, टाटा मोटर्स के पीछे,
इलाइट चौराहा, ललितपुर उ.प्र. 284403
मोबाइल 09450037871


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