बुद्ध की ज़रूरत आज भी है

गौतम बुद्ध विश्व के एकमात्र ऐसे महामानव थे, जिन्होंने पीडि़त मानवता को कष्टों से मुक्ति का राह दिखाई। उन्होंने मनुष्यत्व को प्रतिष्ठा प्रदान करते हुए मानवता को दुःखों से निवृत्ति हेतु अष्टांग मार्ग का सन्देश दिया। इस ज्ञान को प्राप्त करने के लिए बुद्ध जिस प्रक्रिया से होकर गुजरे थे, उसका विश्लेषण करते हुए श्रीलंकाई बौद्ध धम्मदासी भिक्खु केनेथ बी. गुणतुंगे अपनी पुस्तक ‘ह्वाट इज़़ रियलिटी’ में लिखते हैं-“आज से 2500 साल पहले युवा सिद्धार्थ उस मृत्यु की तलाश में अकेले ही निकल पड़े, जो उस समय तक अनजानी, अनसुनी और अज्ञात विचारधारा थी, जिसके रहस्यों से उस समय तक परदा भी नहीं उठा था। सिद्धार्थ मृत्यु से मुक्ति को उसकी सम्पूर्णता में प्राप्त करना चाहते थे। इसे हासिल करने के लिए वे स्वर्गीय वैभव तथा ऐश्वर्यशाली जीवन को भी ठुकरा चुके थे। एक शान्त मस्तिष्क को हासिल करने के लिए राजकुमार सिद्धार्थ को छह इन्द्रियों- नेत्र, कान, जिह्वा, शरीर और स्वयं मस्तिष्क को नियंत्रित करना पड़ा। इसके परिणामस्वरूप इन छह इन्द्रियों के माध्यम से आने वाली समस्त संवेदनाएँ रुक गयीं। यद्यपि उस समय छह इन्द्रियों द्वारा कोई भी संवेदनाएँ नहीं आ रही थीं, किन्तु फिर भी वे उस समय ऐसी अवस्था में पहुँच गए, जहाँ उन्हें बोध या ज्ञान की प्राप्ति हो गई। ऐसा ध्यान से सम्भव हुआ। इस प्रकार राजकुमार सिद्धार्थविश्व के एकमात्र ऐसे अन्वेषक थे, जिन्होंने अपने एकाग्र ध्यानस्थ मस्तिष्क की सहायता से प्राप्त ज्ञान तरंगों से अपने मस्तिष्क-शरीर की आन्तरिक संरचना में झाँकने का सफल प्रयास किया। उन्होंने अपने मस्तिष्क-शरीर के सूक्ष्मातिसूक्ष्म विवरणों, प्रवृत्तियों, कार्यों, प्रक्रियाओं का अनुसन्धान, अध्ययन एवं विश्लेषण किया।उदाहरण के लिए आइए आँखों के माध्यम से देखने की प्रक्रिया का विश्लेषण करते हैं। उन्होंने पाया कि जब कोई वाह्य पदार्थ आँख के प्रभाव क्षेत्र में आता है तो चेतना जाग्रत हो जाती है और इन तीनों (बाह्य पदार्थ, आँख और चेतना) के परस्पर सम्पर्क में आने से दृष्टिकोण आता है, जिसके पश्चात भावनाएँ, विचार इत्यादि घटित होते हैं। तत्पश्चात पहचान की अवस्थाओं से होते हुए अवधारणा का अन्तिम लक्ष्य प्राप्त होता है। उन्होंने अन्य सभी इन्द्रियों पर यही प्रक्रिया आजमाई और इनके परिणामों का सूक्ष्म विश्लेषण किया। सूक्ष्म प्रेक्षण और विश्लेषण के दौरान युवराज सिद्धार्थ को पूर्वाग्रहों, पक्षपाती विचारधाराओं, विचारों एवं दृष्टिकोणों को भी परास्त करना पड़ा, जो प्रत्येक व्यक्ति के मस्तिष्क-शरीर की स्वाभाविक गतिविधियों में शामिल होकर मस्तिष्क को मार्गच्युत करते हैं। इसके लिए सिद्धार्थ ने अपने नवीनतम आविष्कृत औजार का प्रयोग किया और वह था, मस्तिष्क को महाध्यानस्थ अवस्था तक ले जाना, ताकि सांसारिक ज्ञान, अनुभवों, पूर्वाग्रहों, निर्णयों तथा किसी भी प्रकार के मोह को अपने मस्तिष्क से दूर किया जा सके। परिणामस्वरूप उनका मस्तिष्क शुद्धतम हो गय, जैसा पहले किसी का भी नहीं हुआ था। इस शुद्धता में चतुर्दिक् ज्ञान व्याप्त था, एक नए प्रकार का ज्ञान जो हमारे सांसारिक क्षुद्र ज्ञान, विश्वासों, दृष्टिकोणों तथा आदतों को भेद सकता था और सभी सिद्धांतों में निहित सत्य को प्राप्त कर सकता था।इसे ही ‘सूक्ष्मदर्शी ज्ञान’ कहा जाता है। यह एकमात्र ऐसा ज्ञान है, जो अनुभवजन्य समझ के माध्यम से यथार्थ की वास्तविक प्रकृति को उद्घाटित कर सकता है।
इस प्रकार वे यथार्थ के वास्तविक सत्य के ज्ञाता बन गए। उनमें प्रकाश का संचार हुआ और अन्धकार विलीन हो गया तथा उनकी सांसारिक यात्रा के अंत स्वरूप उन्हें अनुभवजन्य ज्ञान (बोध) प्राप्त हुआ। यह बोध उन्हें इससे पूर्व अज्ञात मृत्युहीनता की महत् अवस्था में ले गया। अब राजकुमार सिद्धार्थ ‘बुद्ध’ बन गए, जो प्रकृति की समस्त अवधारएााओं के अन्वेषक थे और ‘मृत्युजित’ थे। उन्होंने विश्व का अतिक्रमण कर लिया, वह विश्व जिससे हम भली-भाँति परिचित हैं। वे ‘विश्व मानव’ में परिणत हो गए, वास्तव में वे विश्व मानव तो बने किन्तु ‘विश्व में रहने वाले मानव’ नहीं बने।“
इस प्रकार प्राप्त ज्ञान के फलस्वरूप बुद्ध ने मनुष्य तथा उसकी इयत्ता को सर्वोपरि माना और यह घोषित किया कि लौकिक संकल्पना ही यथार्थ है, अलौकिकता मिथ्या है। उन्होंने न तो स्वयं को और न ही अपने धर्म को कभी भी अलौकिकता के आवरण में ढँकने का प्रयास किया। उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा कि उनके माता-पिता साधारण नश्वर प्राणी हैं। उन्होंने ईश्वर तथा आत्मा के अस्तित्व को अस्वीकार किया। इस धर्म का मूल आधार दुःखों से मुक्ति का तार्किक रास्ता ढूँढना है।  
सम्भवतः बुद्ध ऐसे एकमात्र महामानव हैं, जिन्होंने सब कुछ केवल दूसरों के लिए किया और अपने लिए कभी कुछ नहीं सोचा। उन्होंने अपना घर और समस्त सुख-सुविधाएँ छोड़ दीं और मानव के असह्य कष्टों का समाधान खोजने में अपना जीवन लगा दिया। परिणामस्वरूप  उन्होंने शान्ति और आनन्द का जो रास्ता खोजा, वह समस्त बुराइयों के खिलाफ भगवान बुद्ध द्वारा की गई चिकित्सा है। इसीलिए उन्हें ‘वैद्यराज’ और ‘स्मृतभेषज प्रदाह’ कहकर भी सम्बोधित किया गया। 7 वीं शताब्दी के महान दार्शनिक चन्द्रकीर्ति ने उन्हें ‘चिकित्सकों का महान सम्राट’ कहकर सम्बोधित किया है।
कालान्तर में बौद्ध धर्म  में भी अवतारवाद, मठवाद, पौरोहित्यवाद, अलौकिकतावाद तथा अकादमिक जीवनशैली की विकृतियाँ घर करने लगी थीं। जिससे संसार का सर्वाधिक वैज्ञानिक एवं तर्कशील धर्म भी उन्हीं रूढि़यों में फँसकर अपनी चमक खोने लगा, जिन रूढि़यों के विरूद्ध महात्मा बुद्ध ने इस वैज्ञानिक धर्म को खड़ा किया था। आज आवश्यकता इस बात की है कि बौद्ध दर्शन को उसकी समग्रता में समझने का प्रयत्न किया जाए।



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