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Showing posts from May 3, 2015

वैदिक काल में भी उपेक्षित थी स्त्री

यह लेख मेरी प्रकाशित हो चुकी पुस्तक "वेदबुक से फेसबुक तक स्त्री" का अंश है. कृपया पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया से उपकृत करें. वैदिक काल में सर्वत्र पत्नी को सम्मान प्राप्त नहीं था। वेदों में ऐसे अनेक प्रसंग आए हैं, जिनसे पति की पत्नी के प्रति हेय दृष्टि का आभास मिलता है। स्त्रियों के विष में ऋग्वेद में जो विवरण आए हैं,‘‘उनके अनुसार स्त्री का मन चंचल होता है, उसे नियंत्रण में रखना असम्भव सा है।1 उसकी बुद्धि भी छोटी होती है।2 वह अपवित्र होती है और उसका हृदय भेड़िये सा होता है।3 यदि विवाह के पश्चात् वधू के घर अपने पर परिवार के किसी सदस्य को, यहां तक कि मवेशियों को भी कुछ हो जाता था, तो उसका दोष आज की भांति ही नववधू के सिर मढ़ दिया जाता था। इस सन्दर्भ में इन्द्राणी और कृषाकपि का प्रसंग4 अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इन्द्र की अनुपस्थिति में वृक्षाकपि ने इन्द्राणी का शील भंग करने का प्रयास किया, जिसे इन्द्राणी में प्रयत्नपूर्वक असफल कर दिया। इन्द्र के आने पर इन्दाणी ने इन्द्र से वृक्षाकपि की शिकायत की, तो इन्द्र ने वृषाकपि पर क्रोध नहीं करते हुए अपितु यह कहकर वे इन्द्राणी को शान्त कर देते हैं…

सेक्युलरिज्म और समाजवाद पर बहस

भारतीय संविधान की  प्रस्तावना के अनुसार भारत एक सम्प्रुभतासम्पन्न, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक, गणराज्य है। सन 1976 में तत्कालीन इन्दिरा गाँधी की सरकार ने आपातकाल के बाद आम जनता को लुभाने के लिए समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष या सेक्युलर ये दो शब्द संविधान की प्रस्तावना में जोड़ दिए थे. गणतंत्र दिवस की 65 वीं जयंती पर भारत सरकार ने  26 जनवरी सन 2015 को जो विज्ञापन जारी किया, उसमें से समाजवादी और सेक्युलर शब्द हटा दिए. इस पर हो रहे विवाद के बीच सरकार अब चर्चा चाहती है . मेरा मानना है कि जिन सन्दर्भों में समाजवाद और सेक्युलर की अवधारणा संविधान की प्रस्तावना में जोड़ी गई थी, वे सन्दर्भ ही अब अप्रासंगिक हो गए हैं. अब न तो समाजवाद अपने जनवादी चेहरे के साथ उपस्थित है और न ही सेक्युलर शब्द की सामाजिक राजनैतिक अर्थों में ज़रूरत है. कुछ मुलायमियत से युक्त राहुलपंथी नेता ही अपने स्वार्थों के लिए इन शब्दों की अस्मिता से लगातार खिलवाड़ कर रहे हैं. जिस भारतीय लोकतंत्र में वोट हासिल करने के लिए नेतागण स्वयंभू बाबाओं से लेकर शाही इमामों और हिन्दू-मुस्लिम, सिख धर्मगुरुओं से अपनी पार्टी के पक्ष में फतवे…

इक्कीसवीं सदी की सर्वश्रेष्ठ हिन्दी फिल्म है रंगरसिया

कुछ फ़िल्में ऐसी होती हैं, जिन्हें देखने के बाद उनका प्रभाव कई दिनों तक मन मस्तिष्क में बना रहता है। मेरे लिए केतन मेहता की रंगरसिया (हिंदी नामकरण) या Colors of passion (English Version) एक ऐसी ही अद्भुत फ़िल्म है। मेरे मतानुसार मराठी उपन्यासकार रणजीत देसाई के जीवनीपरक उपन्यास राजा रवि वर्मा पर आधारित यह फ़िल्म वास्तव में इक्कीसवीं शती की सर्वश्रेष्ठ हिंदी फ़िल्म है। पता नहीं क्यों तथाकथित फ़िल्म समीक्षकों को इस फ़िल्म में खूबियां क्यों नज़र नहीं आईं! केवल सुभाष के झा ने उस समय इसे साल की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म कहा। यह फ़िल्म परदे पर उतारी गई एक बेशकीमती कलाकृति है। भारत में इस फ़िल्म को नवम्बर सन 2008 में ही प्रदर्शित होना था किन्तु इस फ़िल्म के कुछ अंतरंग दृश्यों पर उठे विवादों के कारण यह फ़िल्म 7 नवम्बर सन 2014 को प्रदर्शित हो सकी। आश्चर्य की बात है कि रागिनी एमएमएस और हेट स्टोरी जैसी बकवास फिल्मों को मंज़ूरी दे देने वाला सेंसर बोर्ड एक कलात्मक पेंटिंगनुमा फ़िल्म को स्वीकृति देने में पूरे छह साल लगा देता है। सन 2008 में लन्दन फ़िल्म फेस्टिवल में इसकी काफी सराहना हुई थी। राजा रवि वर्मा के किरदार को रण…

हिन्दू धर्म और विवाह

हिन्दू धर्म में विवाह एक बहुत ही पवित्र संस्कार माना गया है लेकिन बीते कुछ सालों में इस सामाजिक व्यवस्था में दिनों दिन गिरावट आती जा रही है। भव्यता का भोंडा प्रदर्शन, लड़की पक्ष पर खर्चे का बेतहाशा बोझ और लड़के पक्ष का मिथ्याभिमान इस पर भारी पड़ने लगा है। लड़के की शादी में जाने वाला हरेक बाराती अपने आपको किसी शहंशाह से कम नहीं समझता और येन केन प्रकारेण लड़की पक्ष के लोगों का अपमान और तिरस्कार करके आनंदित होता है मानो लड़की पक्ष का होना दुनिया का सबसे बड़ा गुनाह हो। लड़के का पिता या भाई ही नहीं बल्कि उसकी माँ और बहनें भी ऐसे अकड़कर चलते हैं मानो लड़का पक्ष का होना कोई बहुत बड़ी उपलब्धि हो। सवर्णों और पिछड़े वर्ग के हिन्दू समाज में यह दुर्गुण तेज़ी से पैर पसार रहा है। इसके अलावा हथियारों का भोंडा प्रदर्शन, तड़क भड़क, बेतहाशा सजावट में बिजली की गैर ज़रूरी खपत, अनगिनत भोज्य पदार्थ और नोटों की बारिश से इसे तथाकथित आलीशान बनाया जाता है। इसके बाद भी लड़की का पिता हाथ जोड़े खड़ा रहता है और बारातियों पर चढ़े अंगूर की बेटी के खुमार का खामियाजा भुगतता रहता है। क्या कोई हिन्दू धर्मगुरू इन दुर्गुणों को दूर करने की भी…

किसानों की आत्महत्या

किसानों की आत्महत्या की खबरें सुन पढ़कर अनायास ही प्रेमचन्द की कहानी पूस की रात याद आ गई और इस बात पर गहरा क्षोभ भी हुआ कि इस कहानी को लिखे हुए लगभग अस्सी बरस बीत जाने के बावजूद हलकू की तरह आज का किसान भी या तो मजदूरी को किसानी से बेहतर बता रहा है या फिर मौत को गले लगा रहा है।
इक्कीसवीं सदी के डेढ़ दशक बाद भी क्या किसानी रामभरोसे ही रहेगी ? कोई वैज्ञानिक ऐसी कृत्रिम छत क्यों नहीं ईजाद करता जो किसानों को अनावश्यक अतिवृष्टि से निजात दिला सके। ये ग्राउंड वाटर रिचार्जिंग में भी उपयोगी होगा। किसान को फसल पर शत प्रतिशत बीमा करने की शर्त भारत आने वाली बहुराष्ट्रीय बीमा कम्पनियों के आगे क्यों नहीं रखी जाती। बम्पर फसल होने पर गाँव में ही विकसित कुटीर उद्योगों के द्वारा उनकी फसल बेचने की व्यवस्था क्यों नहीं की जाती? फल, सब्ज़ी, दूध, अनाज आदि के भण्डारण और शीतलन एवम् परिवहन के लिए पीपीपी मॉडल पर काम क्यों नहीं किया जाता और सबसे ज़रूरी बात यह कि किसान की उपज खेत में जाकर ही खरीदने की व्यवस्था और बिचौलियों से मुक्ति की कोई ठोस व्यवस्था क्यों नहीं अमल में लाई जाती? आज के किसान को कर्ज से ज़्यादा ज़रूरी है…

नेट न्यूट्रलिटी आज की ज़रूरत है।

आपने सुना ही होगा कि कुछ साल पहले अमरीकी सरकार ने एकाधिकारवादी माइक्रोसॉफ्ट कम्पनी पर भारी जुर्माना लगाया था क्योंकि इस कम्पनी ने अपने सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट के दौरान से व्यापार जगत की स्वस्थ प्रतिस्पर्धा नहीं होने दी और सारी दुनिया को इस बात के लिए मजबूर किया था कि वह केवल उन्हीं के बनाए और विकसित किये गए सॉफ्टवेयर खरीदे. इससे लिनक्स जैसी कम्पनियों को भारी घाटा हो रहा था और दुनिया को भी कोई अन्य विकल्प मौजूद न होने के कारण माइक्रोसॉफ्ट के ही उत्पाद उनकी मनमानी कीमतों पर खरीदने को विवश होना पड़ रहा था. आज से सौ डेढ़ सौ बरस दूर का एक दूसरा उदाहरण आपके सामने रखते हैं. उस समय भारत में चाय की शुरूआत लोगों को मुफ्त चाय देने से हुई और आज भारत का शायद ही कोई ऐसा नागरिक होगा, जिसकी सुबह-सुबह की चेतना चाय पिए बगैर जाग्रत हो जाती हो. अब नेट न्यूट्रलिटी या नेट निरपेक्षता से जुड़े विवाद पर आते हैं. विवाद की शुरूआत एयरटेल, रिलायंस और फ़ेसबुक के कुछ विशेष किस्म के प्लान आने से हुई. एयरटेल ने एयरटेल जीरो नाम से एक विशेष सेवा शुरू की है जिसके तहत एयरटेल के उपभोक्ता को कुछ विशेष कम्पनियों की इन्टरनेट सेव…