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Showing posts from June 16, 2015

साहित्य और सिनेमा

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यदि हम शुरूआती सिनेमा की ओर नज़र दौड़ाएँ, तो पाते हैं कि इसकी शुरूआत ही पौराणिक साहित्य के सिनेमाई रूपान्तरण से हुई.सत्य हरिश्चन्द्र’, ‘भक्त प्रह्लाद’, ‘लंका दहन’, ‘कालिय मर्दन’, ‘अयोध्या का राजा’, ‘सैरन्ध्री’ जैसी प्रारंभिक दौर की फिल्में धार्मिक ग्रंथों की कथाओं का अंकन थीं. इन फिल्मों का धार्मिक और आर्थिक के साथ-साथ सामाजिक उद्देश्य भी था. चौथे दशक से फिल्मों में सामाजिक कथाओं की भी आवश्यकता को महसूस किया जाने लगा और इसके लिए समकालीन साहित्य के रचनाकारों की ओर देखना लाज़मी हो गया. नतीजा यह हुआ कि सिनेमा को मण्टो का साथ लेना पड़ा. मण्टो की लेखनी से ‘किसान कन्या’, ‘मिर्ज़ा गालिब’, ‘बदनामजैसी फि़ल्में निकलीं. प्रेमचंद और अश्क भी इस दौर में सिनेमा से जुड़े और मोहभंग के बाद वापस साहित्य की दुनिया में लौट गए. बाद मेंख्वाजा अहमद अब्बासपाण्डेय बेचन शर्मा उग्रमनोहरश्याम जोशीअमृतलाल नागरकमलेश्वर,राजेन्द्र यादवरामवृक्ष बेनीपुरीभगवतीचरण वर्माराही मासूम रज़ासुरेन्द्र वर्मानीरजनरेन्द्र शर्मा,कवि प्रदीपहरिवंशराय बच्चनकैफी आज़मीशैलेन्द्रमज़रूह सुल्तानपुरीशकील बदायूँन…

हिंदी फॉन्ट का मानकीकरण हो।

कंप्यूटर, लैपटॉप, स्मार्ट फोन आदि नए नवेले संचार माध्यमों में हिंदी का प्रयोग तेज़ी से हो रहा है। गूगल ने हिंदी इनपुट टूल सेवा और बोलकर टाइप करने की सुविधा देकर हिंदी में लिखने वालों की संख्या में इजाफा किया है लेकिन प्रिंट माध्यमों में हिंदी फॉन्ट का मानकीकरण न होने के कारण अराजकता की स्थिति है। विन्डोज़ और लिनक्स प्लेटफार्म पर हिंदी का न तो एक मानक की बोर्ड सेट है और न ही अक्षरों का कुंजीपटल पर स्थान ही निर्धारित है। कनवर्टर का इस्तेमाल करने पर वर्तनी की अशुद्धियाँ हो जाना आम बात है। विशेषकर श और ष की अशुद्धि रह जाना सामान्य घटना है जिसका खामयाजा हम लेखकों को उठाना पड़ता है। यूनिकोड फॉन्ट के हिंदी में भी आ जाने से कुंजीपटल पर अक्षर याद रखने की समस्या से कुछ हद तक निजात तो मिली है किन्तु यहाँ भी अराजकता व्याप्त है। मंगल, चाणक्य आदि अनेक यूनिकोड फॉन्ट होने से और इनका सरकारी स्तर पर मानकीकरण न किए जाने से यह समस्या रहती है कि कोई आलेख, शोधपत्र अथवा लेख किस फॉन्ट में भेजा जाए। यही नहीं बल्कि अक्सर विन्डोज़ के नए वर्ज़न में लेख भेजने पर पुराने वर्ज़न में नहीं खुल पाता। उदहारण के ल…