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Showing posts from June 25, 2015

मेरी प्रकाशित पुस्तक "वेदबुक से फेसबुक तक स्त्री" का अंश

यह लेख मेरी  प्रकाशित  पुस्तक "वेदबुक से फेसबुक तक स्त्री" का अंश है. कृपया पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया से उपकृत करें. वैदिक काल में सर्वत्र पत्नी को सम्मान प्राप्त नहीं था। वेदों में ऐसे अनेक प्रसंग आए हैं, जिनसे पति की पत्नी के प्रति हेय दृष्टि का आभास मिलता है। स्त्रियों के विष में ऋग्वेद में जो विवरण आए हैं,‘‘उनके अनुसार स्त्री का मन चंचल होता है, उसे नियंत्रण में रखना असम्भव सा है।1 उसकी बुद्धि भी छोटी होती है।2 वह अपवित्र होती है और उसका हृदय भेड़िये सा होता है।3 यदि विवाह के पश्चात् वधू के घर अपने पर परिवार के किसी सदस्य को, यहां तक कि मवेशियों को भी कुछ हो जाता था, तो उसका दोष आज की भांति ही नववधू के सिर मढ़ दिया जाता था। इस सन्दर्भ में इन्द्राणी और कृषाकपि का प्रसंग4 अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इन्द्र की अनुपस्थिति में वृक्षाकपि ने इन्द्राणी का शील भंग करने का प्रयास किया, जिसे इन्द्राणी में प्रयत्नपूर्वक असफल कर दिया। इन्द्र के आने पर इन्दाणी ने इन्द्र से वृक्षाकपि की शिकायत की, तो इन्द्र ने वृषाकपि पर क्रोध नहीं करते हुए अपितु यह कहकर वे इन्द्राणी को शान्त कर देते हैं, कि …

'मलाई'

Geeta Shree हमारे समय की महत्त्वपूर्ण लेखिका हैं। उनकी नवीनतम कहानी 'मलाई' एक लड़की की मलाई खाने के प्रति आसक्ति, गोरी होने की लालसा के अन्तर्संघर्ष के बीच झूलते हुए स्त्री विमर्श के कुछ नुकीले सवालों से सामना कराती है। इस कहानी में माँ- पिता और भाई का सुरीली के प्रति अतिशय संरक्षणवादी रवैया मध्यमवर्गीय परिवारों की हक़ीक़त है। भाई और पिता को मलाईदार दूध लेते देखना और खुद को इससे वंचित पाना एक बेहद सामान्य सी दिखने वाली पारिवारिक घटना है जिसे गीताश्री उसकी पूरी बुर्जुआवादी छवि के साथ वे कहानी में पेश कर देती हैं। फेयर एण्ड लवली बनाम मलाई के द्वंद्व में फंसकर सुरिलिया मलाई को चेहरे पर गोरी होने हेतु लगाने से बेहतर अपनी चिरदमित यूटोपियाई चाह कटोरी भर मलाई खाने से पूरी करती है। यह एक लड़की का घर की चौखट पर बैठकर पेट भर मलाई खाना नहीं है अपितु इसके बहाने लेखिका पुरुष वर्चस्व के हथियारों पर अपने तरीके से चोट करती है। यहाँ तक कि नायिका की माँ और इधर की उधर लगाने वाली शीला दाई भी इस दिग्विजयी कार्य में कहीं न कहीं अपनी जीत का भी अनुभव करती है। ऐसे में मलाई सिर्फ दूध की मोटी परत भर न रहकर …

मेरी समस्या

मेरी समस्या
मेरी समस्या यह है कि जब कांग्रेसी नीतियों की आलोचना करता हूँ तो कांग्रेसी मित्र नाराज़ हो जाते हैं, भाजपा की आलोचना पर दक्षिणपंथी मित्रों को बुरा लगता है और वामपन्थ की आलोचना करने पर तो नामवरी मित्र मेरे पीछे ही पड़ जाते है। लेकिन मैंने हमेशा यह प्रयास किया है कि मैं विचारधाराओं की बेड़ियों से मुक्त रहकर अपनी बात कहूँ। इसमें समर्थक भले ही कम मिलें लेकिन इस बात का संतोष तो रहता ही है कि मैंने निष्पक्ष होकर स्वविवेक से लिखा है और जो भी लिखा है उसके लिए मन में कोई अपराधबोध नहीं है।

आपातकाल के 40 बरस

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यूँ तो पण्डित जवाहरलाल नेहरू ने सन 1962 में चीन से युद्ध के समय तथा इंदिरा गांधी ने 1971 में पाकिस्तान से बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के समय भी आपातकाल लगाया था किन्तु इन दो आपातकालों की वैधता पर कोई प्रश्नचिह्न नहीं लगाया जाता क्योंकि उस समय आपातकाल लगाया जाना आवश्यक था क्योंकि देश बाहरी दुश्मन से युद्ध लड़ रहा था लेकिन 25-26 जून की मध्य रात्रि को तत्कालीन प्रधानमन्त्री इंदिरा गांधी ने पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे और अपने बिगड़ैल पुत्र संजय गांधी के कहने पर अपनी कुर्सी बचाने के लिए जो आपातकाल देशवासियों पर थोपा उसके लिए देश उन्हें कभी माफ़ नहीं करेगा। दरअसल यह आपातकाल इसलिए लगाया गया था क्योंकि इलाहबाद उच्च न्यायालय के निर्भीक और निष्पक्ष न्यायाधीश न्यायमूर्ति जगमोहनलाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी के विरुद्ध रायबरेली से चुनाव लड़े राजनारायण की याचिका पर फैसला देते हुए इंदिरा गांधी को चुनाव में हेराफेरी का दोषी पाया और उनकी लोकसभा सदस्यता रद्द कर दी। इसके बाद उच्चतम न्यायालय में भी न्यायमूर्ति वी आर कृष्ण अय्यर ने इस सजा को बरकरार रखा। इंदिरा ने इसके खिलाफ उच्चतम न्याय…