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मोहल्ल्ला अस्सी पर विवाद बेवजह

मोहल्ला अस्सी की रिलीज़ पर दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट द्वारा अगले आदेशों तक रोक लगा दिए जाने से एक बार पुनः अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक भावनाओं के आहत होने का सवाल सतह पर आ गया है. अभी ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब फ्रेंच कार्टून पत्रिका पर आतंकवादियों ने हमला बोल दिया था और धार्मिक भावनाओं के आहत होने के नाम पर अनेक लोगों को मौत की नींद सुला दिया गया था. सलमान रश्दी, तसलीमा नसरीन, एम् ऍफ़ हुसैन, नरेंद्र मोहन आदि अनेक लेखक साहित्यकार फ़िल्मकार धर्म के आखेट होकर अपनी कृतियों पर पाबंदी लगवाने या फतवे जारी होने पर छुपकर रहने या देश निकाला का दंश सहने को विवश हुए हैं.      आश्चर्य की बात है कि इक्कीसवीं सदी के डेढ़ दशक बीत जाने के बाद भी यह धार्मिक भावनाओं के आहत होने के नाम पर अपनी रोटियां सेंकने का यह कार्य बदस्तूर जारी है. चाहे ईश निंदा और काफिरों के विरोध के नाम पर इस्लामिक देशों में हो रहा आइसिस का खूनी खेल हो या एक फिल्म के छोटे से दृश्य में कही गयी छोटी सी बात का विरोध हो, इनमें भला अंतर क्या रह जाता है ? अंतर है तो इतना कि वहां यह खेल खूनी है तो यहाँ यह मानसिक तौर पर हिंसक या राज…