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Showing posts from July 6, 2015

साहित्येतिहास के काल विभाजन के नामकरण का एक लघु प्रयास

एक इतिहास यह भी
हिन्दी साहित्येतिहास लेखन की समस्याएँ विषय पर केन्द्रित समसामयिक सृजन का विशेषांक भाई महेंद्र प्रजापति जी के सौजन्य से प्राप्त हुआ। साहित्येतिहास एक ऐसा विषय रहा है, जो हरेक दौर में आलोचकों को चुनौती देता रहा है क्योंकि साहित्येतिहास न तो कभी खत्म हो सकता है और न ही इसे कोई अंतिम रूप से लिख सकता है। साहित्येतिहास लेखन करते समय समकालीन साहित्य हमारे लिए एक बड़ी मुश्किल खड़ी करता है और प्राचीन साहित्य के क्षेत्र में नवीनतम अनुसंधान से प्राप्त तथ्य पूर्ववर्ती साहित्य के इतिहास लेखन के रास्ते में नए पग चिह्न बना देते हैं, जिनकी उपेक्षा करना मुमकिन नहीं होता। नवीनतम सांस्कृतिक, साहित्यिक, ऐतिहासिक, आर्थिक एवं सामाजिक घटनाक्रम साहित्य पर अपने तीखे निशान छोड़ जाते हैं, जिनकी पहचान करना साहित्येतिहास लेखक की बुद्धिमत्ता की कसौटी होता है। इसके अतिरिक्त साहित्येतिहास लेखन की परंपरा और नवीनतम साहित्य के अद्यतन स्वरूपों का ज्ञान भी एक बड़ा प्रश्न है जिससे मुक्त नहीं हुआ जा सकता।
महेंद्र जी ने अपने संपादकीय में साहित्येतिहास लेखन के विभिन्न कोणों की पड़ताल की है और पूर्ववर्ती साहित्य…

अप्रिय सवालों से जूझती पुरुषोत्तम अग्रवाल की कहानी नाकोहस

पुरुषोत्तम अग्रवाल की ख्याति एक आलोचक के तौर पर है। पाखी  में उनकी कहानी नाकोहस प्रकाशित हुई है। जब मैंने इस कहानी को पढ़ा तो मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि इस कहानी के माध्यम से एक आलोचक यह बताना चाहता है कि एक कथाकार को कैसे कहानी लिखनी चाहिए और वर्तमान समय के वे कौन से हौलनाक सच हैं, जिन्हें आज की कहानी में गढ़ा और मढ़ा जाना चाहिए। एक कलात्मक औदात्य के बोझ से लहूलुहान यह कहानी उत्तर आधुनिक समाज की गप्प गोष्ठियों, मिथकीय अंतर्द्वंद्वों तथा सांप्रदायिक सवालों से जूझती है। समालोचन में राकेश बिहारी ने इसे कथाहीन कहानी कहा है। मैं इससे आगे बढ़कर कहना चाहता हूँ कि यह कहानी वास्तव में कहानी न होकर एक ऐसा विमर्श है जिसमे कहानी की छौंक लगाने का असफल प्रयास किया गया है। गज- ग्राह कथा, पंचतंत्र की कहानियों, नचिकेता, ईसा मसीह, इब्ने सिन्ना इज्तिहादी, वाल्तेयर, लाओत्से, एलिस इन वंडरलैंड के सन्दर्भ के बहाने वे पाठकों को जिस सम्मोहनकारी दुनिया में ले जाना चाहते हैं, वास्तव में वे उसे वहां तक नहीं ले जा पाते और पाठक यह जान पाने में असमर्थ रहता है कि 'पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है'। विवरणों की बहु…