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आदिवासी समाज के इतिहास की दारुण गाथा है ‘आदिवासी अभिव्यक्ति’

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भाई रवि कुमार गोंड़ आदिवासी लेखकों में तेज़ी से पहचान बनाने वाला नाम है. इस युवा साहित्यकार ने साहित्य जगत में बीते कुछ वर्षों में अपने निरंतर लेखन से हमारा ध्यान खींचा है. रवि की नवीनतम उपलब्धि है उनकी हाल ही में प्रकाशित लम्बी कविता 'आदिवासी अभिव्यक्ति',जिसकी शुभाशंसा लिखने का सौभाग्य मुझे मिला है. पेश है मेरे द्वारा लिखित शुभाशंसा




आदिवासी समाज के इतिहास की दारुण गाथा है ‘आदिवासी अभिव्यक्ति’ बीते कुछ वर्षों में आदिवासी विमर्श ने समकालीन हिन्दी साहित्य में तेज़ी से अपनी दस्तक दी है. आदिवासी विचारधारा और दर्शन को बढ़ाने में जिन साहित्यकारों का योगदान रहा है, उनमें युवा कवि समीक्षक रविकुमार गोंड का नाम प्रमुखता से लिया जाना चाहिए. रवि ने अत्यल्प आयु में साहित्य जगत के इस अपेक्षाकृत नए विमर्श को अपने गम्भीर चिंतन एवं वैचारिक आयामों से समृद्ध करने का सराहनीय प्रयास किया है. रवि समीक्ष्य लम्बी कविता ‘आदिवासी अभिव्यक्ति’ के माध्यम से हमें आदिवासियों के उस संसार में ले जाते हैं, जहाँ का इतिहास कतिपय निहित स्वार्थों के कारण आज तक उपेक्षित ही रहा और उन्हें इतिहास-पुराण  के सबसे निचले पायदा…