आखिर इस मर्ज की दवा क्या है ?

आखिर इस मर्ज की दवा क्या है ?
विश्व युद्ध की मौतों और देशों के आपसी युद्धों को छोड़ दें तो इक्कीसवीं शताब्दी अब तक की सबसे रक्तरंजित शताब्दी होने जा रही है। हमने सोचा था कि पढ़-लिखकर हम कुछ अधिक मानवीय, अधिक सभ्य, अधिक उदार और अधिक विश्व नागरिक बनेंगे लेकिन बीते कुछ समय से देखा जा रहा है कि तथाकथित पढ़े-लिखे लोग अधिक कट्टर, अधिक धर्मांध और अधिक संख्या में आतंकी बन रहे हैं। आखिरकार कमी कहाँ है?
यह एक ऐसा सवाल है, जिसका उत्तर सम्पूर्ण मानवजाति को अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए खोजना ही होगा। आइसिस का बकर अल बगदादी बगदाद यूनिवर्सिटी से पी-एच. डी. है, नक्सलवादियों के समर्थक कुछ दिग्भ्रमित प्रोफेसर और तथाकथित बुद्धिजीवी हैं, कश्मीर की हिंेसा को जायज ठहराने वाले भी कुछ तथाकथित पढ़े-लिखे प्रभु वर्ग के प्रशांत भूषण टाइप के लोग हैं। हाइड्रोजन बम के परीक्षण से समूची दुनिया की शान्ति को भंग करने वाला उत्तर कोरिया का बददिमाग तानाशाह किम जोंग उन भी काफी पढ़ा लिखा माना जाता है।
दुनिया के किसी भी कोने में घटने वाली किसी भी घटना का संचार क्रान्ति के युग में बेहद गहरा और अचूक प्रभाव पड़ता है, राजनेतागण और जिम्मेदार लोग जब बड़बोलेपन अथवा असावधानीवश इसका भी ध्यान नहीं रखते तो उनके किसी कृत्य अथवा बयान का दुष्प्रभाव आतंक के उभार तक में बदल सकता है। शार्ली एब्दो की दुखद धर्मांध प्रतिक्रिया इसी का उदाहरण थी। बेहतर होता कि शार्ली एब्दो का जवाब गोली की जगह कलम देती लेकिन शायद कलम की खामोशी बंदूक को गोली उगलने का अवसर दे दिया करती है।
अगर भारत की बात करें तो वर्तमान समय में आइसिस से सम्बन्ध रखने वाले या हमदर्दी रखने वाले जितने भी आतंकवादी पकड़े जा रहे हैं, उनमें से अधिकांश उच्च शिक्षित हैं। कोई साॅफ्टवेयर इंजीनियर है तो कोई बहुराष्ट्रीय कंपनी का बड़ा अधिकारी। इण्टरनेट तक सबकी सहज पहुँच होने के कारण धर्मांधता और कट्टरपंथी विचारधारा के पनपने में तेज़ी दिख रही है। इसका सबसे बड़ा कारण हमें अपने समाज के भीतर खोजना होगा। आज देश के विरोध में बोलने वाले तथाकथित वामपंथी बुद्धिजीवियों को प्रगतिशील और आधुनिक माना जाता है। तुष्टीकरण की क्षुद्र वोटखींचू राजनीति इस बात का भी लिहाज नहीं करती कि आतंकवाद या आतंकवादियों का महिमामण्डन करने से देश के सामाजिक मस्तिष्क पर कितना बुरा प्रभाव पड़ता है। आतंकवाद के अन्तर्गत कश्मीर समस्या, आॅपरेशन ब्लू स्टार, पूर्वोत्तर की समस्या, नक्सलवाद, पाकिस्तान द्वारा सीमा पार से फैलाया जा रहे आतंकवाद के साथ भारत को अब अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर फैल रहे आइसिस के आतंकवाद से भी जूझना है, जो समूचे भारतीय उपमहाद्वीप को ‘खुरासान’ नाम से कट्टरपंथी देश में बदलने पर उतारू है, जहाँ वह पाशविकता का नंगा नाच करने का मंसूबा पाले हुए है। चीन, बांगलादेश, नेपाल, म्याँमार, श्रीलंका जैसे पड़ोसी देशों में सक्रिय भारत के दुश्मन आतंकवादी भी भारत की शांति को नष्ट करने की दुरभिसन्धि करते रहते हैं।
हमारी समस्या यह है कि हम इक्कीसवीं सदी में भी जाति, धर्म, संप्रदाय, क्षेत्र, गोत्र, भाषा जैसे गैरज़रूरी मुद्दों में उलझे हुए हैं और आसन्न संकट को हल्का आंकते हैं। इन सबके बीच आज ज़रूरत इस बात की है कि उदारवादी सहिष्णु भारतीय परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए ज़्रूरी कदम उठाए जाएँ। बुद्धिजीवियों को भी अपना शुतुरमुर्गी खोल उतारकर देश का हित सर्वोपरि समझना चाहिए। बड़बोले राजनेताओं पर भी शान्तिभंग की कठोर कार्रवाई करते हुए उन्हें उनके लिए मुफीद जगह अर्थात जेल भेजे जाने की ज़रूरत है। इससे उनमें कानून का भय पैदा होगा और उनमें खुद को कानून से ऊपर समझने की प्रवृत्ति पर लगाम लगेगी। आतंक के जो स्लीपर सेल इस समय देशविरोधी कृत्यों में संलग्न हैं, उनके लिए कठोरतम कानून बनाकर उन पर कार्रवाई की जानी चाहिए। एक कहावत है कि बुराई तभी उभरती है, जब अच्छाई खामोश या उपेक्षित रहती है। इसलिए सभी धर्मों के अच्छे लोगों और उनके कार्यों को हाईलाइट करने की ज़रूरत है। मीडिया की भी समस्या यह है कि वह निगेटिव रिपोर्टिंग पर ही अधिक आश्रित रहती है। उसे भी पाजि़टिव न्यूज़ के महत्त्व को समझना होगा क्योंकि 26 नवम्बर 2008 को मुंबई में हुए आतंकी हमले में उनकी सबसे पहले सबसे तेज़ न्यूज़ की स्वार्थपरकता से आतंकवादियों को ही फायदा पहुँचा था। उनके द्वारा आतंकियों से लड़ाई के लाइव टेलीकाॅस्ट से आतंकवादियों के आकाओं को टीवी पर लाइव मुठभेड़ देखकर आतंकियों को रणनीति बताने और इस मुठभेड़ को लम्बा खींचने में सहायता मिली थी और कई निर्दोष जानें, जो बचाई जा सकती थीं, होम हो गयी थीं। इसके विपरीत सर्वधर्म समभाव को बढ़सवा देने, धार्मिक सौहार्द्र की भावना को पोषित करने तथा धर्मों को एक दूसरे के निकट लाने वाले कार्यक्रमों एवं प्रयासों को मीडिया टीआरपी की दृष्टि से अनुपयोगी समझता है। उदाहरण के लिए आरएसएस, जमाअत इस्लामी हिंद, मिशनरीज़ आॅफ़ चैरिटी आदि संस्थाओं के कल्याणकारी कार्यों को वृहद स्तर पर सराहे जाने की आवश्यकता है और इनमें स्वेच्छा से जुड़ने की ज़रूरत है। इन संस्थाओं को भी परस्पर सामंजस्य के साथ कट्टरपंथी ताक़तों के खिलाफ लड़ने के लिए एकजुट होने के लिए आगे आना होगा। इसके अतिरिक्त बिस्मिल और रोशन जैसे देशभक्तों की दोस्ती और बलिदान की अनेक इधर-उधर बिखरी हुई कहानियों को पाठ्यक्रम में स्थान देने के लिए सरकारी स्तर पर पहल होनी चाहिए, तभी हम इस देश की बरसों से चली आ रही शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की परंपरा को कायम रख सकेंगे और देश को आतंके के खिलाफ युद्ध के लिए मानसिक तौर पर तैयार कर सकेंगे।

 

Comments

  1. बेहतरीन टिप्पणी।

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    1. धन्यवाद आदरणीय संजीव जी

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  2. पुनीत सर का लेख एक महत्वपूर्ण विषय को उजागर कर रहा है. पर प्रश्न अब भभी वहीं है की यह पढ़े लिखे लोग आतंकवाद की और झुक क्यों रहे है?

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    1. सर. इस प्रश्न का उत्तर अपनी आतंकवाद पर आने वाली पुस्तक में देने का प्रयास करूंगा.

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  3. डर है कहीं हालत बदतर ना हो जाए
    जुल्मों सितम के शिकार ना हो जाए
    उत्तम लेख आज के संदर्भ में कारगर आज के युवाओ को समझना पड़ेगा की देश भक्ति और आतंक में क्या फर्क है------------------------------------



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    1. सुन्दर प्रतिक्रिया हेतु आभार आराधना जी

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