आदिवासी समाज का सच

आदिवासी समाज वास्तव में एक ऐसा समाज है, जिसने अपनी परम्पराएं, संस्कार और रीति-रिवाज संरक्षित रखे है। हॉ यह बात सही है कि अपने जल, जंगल-जमीन में सिमटा यह समाज शैक्षिक आर्थिक रूप से पिछड़ा होने के कारण राष्ट्र की विकास यात्रा के लाभों से वंचित है। डॉ. रमणिका गुप्ता आदिवासियों के विषय में अपना अभिमत व्यक्त करते हुए लिखती हैं, ”यह सही है कि आदिवासी साहित्य अक्षर से वंचित रहा, इसलिए वह उसकी कल्पना और यथार्थ को लिखित रूप से न साहित्य में दर्ज कर पाया और न ही इतिहास में। हॉ लोकगीतों, किंवदन्तियों, लोककथाओं तथा मिथकों के माध्यम से उसकी गहरी पैठ है।“
यह सच है कि दलित तबका शिक्षा, विकास तथा धनार्जन के मूलभूत अधिकारों से वंचित रखा गया, किन्तु ऐतिहासिक तथ्य यह है कि अंग्रेजों को भारत से खदेड़ने के लिए पहला विद्रोह तिलका मांझी ने सन् 1824 में में उस समय किया था, जब उन्होंने अंग्रेज़ कमिश्नर क्लीवलैण्ड को तीर से मार गिराया था। सन् 1765 में खासी जनजाति ने अंग्रेज़ों के विरूद्ध विद्रोह किया था। सन् 1817 ई. में खानदेश आन्दोलन, सन् 1855 ई. में संथाल विद्रोह तथा सन् 1890 में बिरसा मुंडा का आन्दोलन अंग्रेज़ों के विरूद्ध आदिवासियों के संघर्ष की गौरव गाथाएं हैं, किन्तु दुर्भाग्य की बात है कि इतिहाकार 1857 ई. को ही नवजागरण का प्रस्थान बिन्दु मानते हैं और आदिवासियों के सशस्त्र विद्रोह की उपेक्षा कर देते हैं। यह अत्यन्त क्षोभ की बात है कि जिन आदिवासियों ने भारतभूमि को अंग्रेज़ों के चंगुल से बचाने के लिए संघर्ष छेड़ा, उन्हीं दीन-हीन अबोध आदिवासियों को स्वाधीनता मिलने के बाद से ही विकास के नाम पर उनके जल, जंगल और जमीन से खदेड़ने का अभियान शुरू कर दिया गया।
परिणाम यह हुआ कि जिन जंगलों में आदिवासी पर्यावरण के साथ एकात्मता स्थापित करते हुए निवास किया करते थे, उन्हें विकास की आवश्यकता के नाम पर उजाड़ दिया गया और वहां पर बड़े-बड़े कल-कारखाने, खदान, बांध आदि बना दिए गए। रमणिका गुप्ता ”हादसे“ कहानी में ऐसा ही एक चित्र खींचते हुए कहती हैं ”मज़दूर सब पिछड़े, दलित, आदिवासी बड़ी जाति के लोग डण्डा लेकर घूमते निरर्थक मारपीट कर अपना आतंक जमाते, लेकिन मेहनत या मज़दूरी कभी नहीं करते थे। मज़दूरी करना, खेत जोतना अर्थात् जाति बहिष्कृत होना। खासकर छोटा नागपुर में एक सौ बीघे खत का मालिक भी चपरासी की नौकरी खुशी-खुशी करना पसन्द करता था, पर अपना परती पट्टा खेत जोतने से उसकी प्रतिष्ठा पर धक्का लगता था।
”भिलाई वाणि“ पत्रिका के आदिवासियों के शोषण का चित्र खींचते हुए ”यहां सब बिकता है“ शीर्षक से लेख में लिखा है, ”करोड़ों रूपयों का प्रसाधन, प्रकृति खनिज सम्पदा गरीब तबके के बेसहारा लोग छोटे-छोटे आरोपों व संघर्ष में फंसकर अपराधी के रूप में सालों-साल जेलों में सड़ते रहते हैं, वहीं धन-बल वाले करोड़ों रूपयों का घोटाला करने के बाद भी खुलेआम घूमते दिखते हैं। जेलों में सड़ने वालों ने सर्वाधिक संस्था मुस्लिम, दलित, आदिवासी ही हैं और उनके साथ-साथ उनके लिए आवाज़ उठाने वाले बुद्धिजीवी और क्रान्तिकारी भी 15-20 वर्षों स जेलों में सड़ रहे हैं।
यदि आंकड़ों पर गौर करें तो हम पाते हैं कि आदिवासी देश की कुल आबादी का 8.14 प्रतिशत भूभाग पर हैं और भारत के भौगोलिक क्षेत्रफल के 15 प्रतिशत भूभाग पर ये निवास करते हैं। भारत का संविधान आदिवासी अथवा अनुसूचित जनजाति समाज को अलग से परिभाषित नहीं करता किन्तु संविधान के अनुच्छेद-366 (25) के अन्तर्गत ”अनुसूचित“ का सन्दर्भ उन समुदायों में करता है, जिन्हें संविधान के अनुच्छेद-342 में अनुसूचित किया गया है। संविधान के अनुच्छेद-342 के अनुसार अनुसूचित जनजातियां वे आदिवासी या आदिवासी समुदाय या इन आदिवासी समुदायों का भाग या उनके समूह हैं, जिन्हें राष्ट्रपति द्वारा एक सार्वजनिक अधिसूचना द्वारा इस प्रकार घोषित किया गया है। किसी समुदाय के अनुसूचित जनजाति में विशिष्टीकरण के लिए पालन किए गए मानदण्ड हैं, आदिम लक्षणों का होना, विशिष्ट संस्कृति, भौगोलिक बिलगांव, वृहत्तर समुदाय से सम्पर्क में संकोच और पिछड़ापन। यह दुखद तथ्य हैं कि आदिवासी समाज की 52 प्रतिशत आबादी गरीबी की रेखा के नीचे जीवनयापन करती है तथा 54 प्रतिशत आदिवासियों के पास आर्थिक सम्पदा, संचार और परिवहन की पहुंच रही है।
आदिवासियों की साक्षरता की प्रगति यात्रा इस चार्ट से समझी जा सकती है-
वर्ष कुल साक्षर आबादी अनु.जनजाति की आबादी कुल स्त्री आबादी अनु.जनजाति की स्त्री आबादी
1961 24ः 8.5ः 12.9ः 3.2ः
1971 29.4ः 11.3ः 18.6ः 4.8ः
1981 36.2ः 16.3ः 29.8ः 8ः
1991 52.2ः 29.6ः 39.3ः 18.2ः
2001 64.84ः 47.1ः 53.6ः 34.7ः

भारत में आदिवासी समूहों की संख्या-700 से अधिक है। सन् 1951 की जनगणना के मुताबिक उनकी आबादी 1,91,11, 498 थी, जो सन् 2001 की जनगणना में बढकर 8,43,26,240 हो गयी। आदिवासियों के निवास की दृष्टि से भारत के क्षेत्र को चार भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है। ये हैं- उत्तर पूर्वी क्षेत्र, मध्य क्षेत्र, पश्चिमी क्षेत्र और दक्षिणी क्षेत्र।
उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के अन्तर्गत हिमालयी क्षेत्र और ब्रह्मपुत्र की यमुना-पद्मा शाखा के पूर्वी भाग का पर्वतीय क्षेत्र आता है। यहां गुरूंग, लिंबू, लेपचा, आका, डाफल, अबोर, मिरी, मिशमी, सिंगपी, मिकिर, राम, कवारी, गारो, खासी, नागा, कुकी, लुशाई, चकमा, न्यीशी, आदी, गालो, आपातानी, मोमपा, तागीन, शेरदुरूपेन, खामती, सिंगफो, नाक्टे, बांग्चू, तांगसा, आका, मिजी, मेमबा, बु्रगुन, मर्रम, रियाम आदि प्रमुख आदिवासी जनजातियां निवास करती हैं। मध्य क्षेत्र का विस्तार उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले से लेकर दक्षिणी और राजमहल पर्वतश्रेणी के पश्चिमी भाग से होता हुआ दक्षिण में गोदावरी तक है। इस क्षेत्र संथाल, मुंडा, उरांव, भूमिज, हो, खडि़या, बिरहोर, जुआंग, खोंडं, सवरा, गोंड, भील, बैगा, कोरकू, कमार, असेर, बिरजा, हिल खढिया, कोरवा, माल पहाडि़या, सौरिया, सवर सहारिया, अबूझमाडि़या, भाडि़या, बुक्सा, रजिया आदि जनजातीय लोग निवास करते हैं।
पश्चिमी क्षेत्र में मध्य पश्चिम राजस्थान से होकर दक्षिण सहयाद्रि पर्वतश्रेणी तक का पश्चिमी भाग आता है। इस भाग में मीजा, ठाकुर, कटकरी, कोलम, माडि़या, ग्रेट अण्डमानी, जारवा, ओंगे, सेंटनेली, शोम्पेन आदि जनजातियां निवास करती हैं। दक्षिण क्षेत्र के अन्तर्गत गोदावरी के दक्षिण से कन्याकुमारी तक का सम्पूर्ण क्षेत्र आता है। इस भाग में चेंचू, कोड़ा, रेड्डी, राजगौंड, कोया, कोलाम, कोटा, कम्माद, कांडकाफ, कोंडदोरा, कोंड, कोरिया, कोया, कूलिया, गोंड, गौड़, जातपू, थोटी, धूलिया, नक्कला, नायकपोड, परधान, पोरजा, भगता, भील, मलिस, मन्नदोरा, मूकदोरा, यानादि, येरूकला, रेड्डिदोरा, रैना, बाल्मीकि, सवरा, सुगांली (बंजारा/लंबाडा) कुरूंबा, बडागा, टोडा, काडर, मलायन, मुशुवन, उदाली, कनिक्कर, बोडो गऊबा, गुडोब गऊबा, चेन्दू, पूर्जा, डोंगरिया, खोंड, चोलानायकन, कादर, कट्टाउनायकन, इरूला, पजियन आदि निवास करते हैं।
इन आदिवासी समुदायों का मुख्य व्यवसाय कृषि, खाद्य संग्रहण तथा मछली पालन रहा ह। जल, जंगल तथा जमीन पर अतिक्रमण होने से इन आदिवासी लोगों के जीवन-यापन का प्रमुख सहारा छिनने लगा है।
आदिम जनजातियों की दशा की समीक्षा के लिए भारत सरकार ने सन् 1969 में योजना आयोग के अन्तर्गत ”शीलु आव समिति“ गठित की, जिसने अपने निष्कर्षों में यह पाया कि जनजातीय समाज के अधिकांश लोग अत्यधिक पिछड़े हुए हैं और इनमें से कुछ तो अभी भी आदिकालीन अन्न संचय युग में जी रहे हैं। इस समिति ने इन समुदायों पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता पर बल दिया। बाद में सन् 2006 में वनाश्रित समुदाय के अधिकारों को मान्यता देने के लिए ”अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परम्परागत निवासी (वनाधिकारों को मान्यता) कानून बनाया गया। यह कानून देश के जंगलों को बचाने तथा वनवासी आदिवासियों को वनाधिकार प्रदान करने की दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण है।
इससे पहले स्वतंत्रता मिलने से पूर्व अनेक राजनैतिक चिन्तकों एवं समाज सुधारकों का ध्यान आदिवासियों की दयनीय दशा की ओर गया था, किन्तु पराधीन होने के कारण उन्हें आदिवासियसों के कल्याण में कोई राजकीय सहायता प्राप्त न हो सकी। अंग्रेज़ों ने उन्हें एकाकी और असहाय इसलिये छोड़ दिया था क्योंकि वे यह समझते थे कि इन जंगली इलाकों का प्रशासन संभालना उनके लिए मुश्किल कार्य है और अंग्रेज़ों के विरूद्ध युद्ध की शुरूआत करने वाले आदिवासियों के प्रति उनके मन में सहानुभूति भी नहीं थी। स्वतंत्रता मिलते ही प्रथम प्रधानमंत्री पण्डित जवाहर लाल नेहरू ने आह्वान किया कि आदिवासी जीवन एवं संस्कृति को पूर्णतः सम्मान दिया जाना चाहिए तथा आदिवासी भाइयों के साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार किया जाना चाहिए। वे चाहते थे कि आदिवासी नागरिक भी सामान्य भारतीयों की तरह आधुनिक जीवन शैली तथा उपलब्ध सुविधाओं का इस प्रकार उपभोग करें कि उनके परम्परागत जीवन पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। उन्होंने आदिवासी भाषाआंे एवं बोलियों के संरक्षण पर बल दिया तथा आदिवासी जमीन एवं जंगलों के संरक्षण की अपील की। नेहरू ने अपनी आदिवासी नीति के चार मार्गदर्शक सिद्धान्त बनाए जो निम्नलिखित थे-
1- आदिवासी समाज की संस्कृति, कला तथा भाषा को सर्वश्रेष्ठ तरीके से संरक्षित विकसित एवं पल्लवित करना।
2- आदिवासियों के आर्थिक अधिकारों का संरक्षण करना।
3- आदिवासियों को राजनैतिक तथा भावनात्मक रूप से भारतीय गणमंत्र के प्रति आकृष्ट करना तथा उनमें राष्ट्रप्रेम की भावना जाग्रत करना।
4- आदिवासियों को समान अवसर प्रदान करने के लिए रोजगार, शिक्षा तथा कल्याणकारी क्षेत्रों में आरक्षण का प्रावधान करना।
यद्यपि इनमें से कुछ बिन्दुओं पर पण्डित नेहरू अपनी नीतियां लागू कराने में सफल रहे किन्तु वे आदिवासी समाज तथा विकास के चक्रव्यूह में ऐसे उलझे कि विकास आदिवासी समुदाय पर हावी हो गया, जिसकी परिणति आदिवासियों के शोषण एवं विस्थापन के रूप में सामने आई।
जब किसी जाति, समाज या समुदाय पर शासकीय उपेक्षा, शोषण और अत्याचार का दंश झेलना पड़ता है। तब कुछ लोग हमदर्दी का नाटक कर अपना उल्लू सीध करने हेतु ऐसे लोगों के बीच पहुंच जाते हैं। स्वतंत्रता मिलते ही क्रिश्चियन मिशनरी ऐसे इलाकों में सेवा के नाम पर धर्मान्तरण का खेल-खेलने में लग गए हैं और अभी पिछले कुछ वर्षों से खाड़ी देशों के मुस्लिम नेताओं ने इसी लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए इन इलाकों में धर्मान्तरण हेतु धन उपलब्ध कराना शुरू कर दिया है। उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के आदिवासी इलाकों में विशेषकर खासी, लुशाइक तथा नागा समूहों में ईसाइयों ने भारत संख्या में धर्मान्तरण किए हैं। ऐसे धर्मान्तरण प्रायः बलपूर्वक या बहला-फुसलाकर किए जाते रहे हैं। आदिवासी इलाकों की दूसरी बड़ी समस्या उनका हथियार उठाना है। शोषण एवं विस्थापन से त्रस्त उत्तर पूर्वी तथा मध्य क्षेत्र के आदिवासियों ने सरकार के विरूद्ध सशस्त्र संघर्ष छेड़ दिया है तथा वे नक्सलवादियों के रूप मंे भारत सरकार के समक्ष कानून व्यवस्था की चुनौतियां खड़ी करते रहते हैं। आज आवश्यकता उनके जीवन-यापन के अधिकारों का संरक्षण किया जाए तथा उन्हें उनकी परम्पराओं के साथ आधुनिकता का समन्वय करने हेतु पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराए जायें।
साहित्यिक दृष्टि से यदि आदिवासी स्वर का मूल्यांकन किया जाए तो हम पाते हैं कि आपके आदिवासी अपने अधिकारां के प्रति जागरूक होते जा रहे हैं तथा उन्हें तथाकथित सभ्य शहरियों की दुरभिसन्धियों का भान होने लगा है। निर्मला पुतुल अपनी कविता ”तुम्हारे अहसान लेने से पहले सोचना पड़ेगा हमें“ में आदिवासियों की इसी सोच को अभिव्यक्ति देते हुए कहती है-
अगर हमारे विकास का मतलब
हमारी बस्तियों को उजाड़कर कल-कारखाने बनाना है।
तालाबों को भापकर राजमार्ग,
जंगकों का सफाया कर ऑफिसर्स कॉलोनियां बसाती हैं,
और पुनर्वास के नाम पर हमंे
हमारे ही शहर की सीमा से बाहर हाशिए पर धकेलना है
तो तुम्हारे तथाकथित विकास की मुख्यधारा में
शामिल होने के लिए
सौ बार सोचना पड़ेगा हमें।“
आदिवासी वास्तव में भारत भूमि की आदिम संस्कृति के पहरूए हैं। यह वह संस्कृति है, जिस पर अन्य संस्कृतियों का हमला नहीं हो सका है और जिसने अपनी परम्पराओं को इक्कीसवीं शदी के दुष्चक्रों के बावजूद सहेजकर रखने में कामयाबी पाई है लेकिन फिर भी इनके साथ जो अत्याचार हो रहा है, उसका चित्रण डॉ. भीम अपनी कविता ”हम आदिवासी हैं“ में करते है-
इस देश के मूल निवासी हैं,
हम आदिवासी हैं,
हम आदिवासी हैं।
हमारा जीवन सहज
सरल एवं न्यायपूर्ण है फिर भी,
सदियों से शोषण का चक्र चला,
सदा उसने हमें दबोचने का यत्न किया
सत्ताधारी, पंूजीपति
सेठ, साहूकार, ठेकेदार
पुलिस, सरकारी कर्मचारी
सबने हमारा शोषण किया, दमन किया
जल, जंगल, जमीन से
पहाड़ों, झीलों एवं नदियों से
हमें बेदखल करने का भरपूर प्रयास किया
हमारी रोजी-रोटी हड़पने का ज़ोरदार यत्न किया
हम आदिवासी हैं।
साक्षर हो जाने के बाद आदिवासी समाज से निकले कवियों लेखकों ने अपने समाज को जागरूक करने को बेड़ा उठाया है। उन्हें यह समझ में आने लगा है कि हमारे हितों की बात करने वाले ढोंगी लोग हमारे ही शोषण का वायस बन गए हैं और वे हमारी गाथा बेचकर स्वयं धनी हो रहे हैं, जबकि हम वहीं हैं, जहां पहले हुआ करते थे-
हम स्टेज पर गए ही नहीं
और हमें बुलाया भी नहीं गया
उंगली के इशारे से
हमें अपनी जगह दिखा दी गई
हम वहीं बैठे रहे
हमें शाबासी मिली
और वे मंच पर खेड़ होकर
हमारा दुख हमसे ही कहते रहे
हमारा दुख हमारा ही रहा
कभी उनका नहीं हो पाया
हमने अपनी शंका फुसफुसाई
वे कान खड़ेकर सुनते रहे
फिर ठण्डी सांस भरी
और हमारे ही कान पकड़ हमें डांटा
माफी मांगो, वरना-------।।“
युवा कवि अनुज लुगुन ने आदिवासियों की जिजीविषा उसके आत्म संघर्ष तथा तनाव को वासी देते हुए कहा है-
”लड़ रहे हैं,
नक्शे में घटते अपने घनत्व के खिलाफ
जनगणना में घटती संस्था के खिलाफ गुफाओं की तरह टूटती
अपनी ही जिजीविषा के खिलाफ
इनमें भी वही आक्रोश है
जो या तो अभावग्रस्त हैं
बाकी तटस्थ हैं।“
विकास का पहिया किस प्रकार आदिवासियों के भविष्य को कुचलता हुआ उसकी संभावनाओं के द्वारों पर कुठाराघात कर रहा है, उसे देखना हो तो अण्डमान के आदिवासी कवि हरिराम मीणा की निम्नांकित पंक्तियों में देखिए-
”समुद्रों से उठ रही है आग की लपटें
पृथ्वी की सारी सभ्यता
एक भीमकाय रोडरोलर की मानिन्द
लुढ़कती आ रही है हमारी जानिव
और हम बदहवास।।“
अनुज लुगुन की एक अन्य मशहूर कविता है ”अघोषित उलगुलान“। इस कविता में अनुज आज के आदिवासियों को जीने के अधिकार हांसिल करने के लिए किन समस्याओं से होकर गुजरना पड़ रहा है, इसका चित्र खींचते हुए चलते हैं कि कंक्रीट के जंगलों से प्रकृति के जंगलों को बचाने के लिए ज़हर बुझे तीरों से उन्हें किस प्रकार युद्ध करना पड़ रहा है-
”वे जो शिकार खेला करते थे निश्चिंत
ज़हर बुझे तीर से
या खेलतेथे रक्त-रंजित होली,
अपने स्वत्व की ऑच से।
खेलते हैं शहर के
कंक्रीटीय जंगल में
जीवन बचाने का खेल
शिकार-शिकार बने फिर रहे हैं
शहर में
अघोषित उलगुलान में
लड़ रहे हैं जंगल।“
कवि विनायक तुमराम आदिवासियों की ओर से विकास के ठेकेदार नरभक्षियों को चेतावनी देते हुए कहते हैं-
”मित्रवर तुम्हारे तरवश में
तड़पने वाले तीक्ष्ण तीर से
करूंगा मैं क्रान्ति
बनाऊंगा क्रान्ति की मशाल
तुम्हारे अंगूठे से बहे रक्त से
लिखूंगा मृत्युलेख।“
बाज़ार ने सृष्टि के सभी व्याकरण उलट दिए हैं। आज सम्पूर्ण विश्व बाज़ार के संकेतों पर नर्तन कर रहा है। बाज़ार ने सबसे ज़्यादा अहित आदिवासी समाज का किया है क्योंकि उसकी सबसे बड़ी चोट खनिज सम्पदाओं पर पड़ी है क्योंकि उसने इनका अन्धाधुंध दोहर शुरू कर दिया है। बाज़ार के क्रूर तथा भयावह चेहरे को मदन कश्यप अपनी कविता ”आदिवासी“ में अभिव्यक्त करते हुए बताते हैं-
ठण्डे लोहे सा अपना कन्धा ज़रा झुकाओ
हमें उस पर पांव रखकर लम्बी छलांग लगानी है
मुल्क को आगे ले जाना है
बाज़ार चहक रहा है
और हमारी बेचैन आकांक्षाओं में साथ-साथ हमारा आयतन भी
बढ़ रहा है
तुम तो कुछ हटो रास्ते से हटो।“
कुछ वर्ष पहले प्रख्यात मलयाली फिल्म निर्देशक अडूर गोपालकृष्णन ने एक साक्षात्कार में बताया था कि उन्होंने स्वयं देखा था कि एक भारतीय इलाके के सम्पूर्ण पहाड़ को काटकर जापान भेज दिया गया, ताकि वहां के पर्यावरण का संरक्षण किया जा सके। शायद उसी से प्रभावित होकर अनुज लुगुन अपनी कविता में कह उठते हैं-
बाज़ार भी बहुत बड़ा हो गया है
मगर कोई अपना सगा दिखाई नहीं देता
यहां से सबका रूख शहर की ओर कर दिया गया है
कल एक पहाड़ को ट्रक पर जाते हुए देखा
उससे पहले नदी गयी
अब खबर फैल रही है कि
मेरा गांव भी यहां से जाने वाला है।“
निष्कर्ष यह कि आदिवासी समाज जल, जंगल और जमीन पर आधारित आदिम समाज है, जिसकी जड़ें उसकी पुरातनता तथा परम्पराओं में निहित हैं, परन्तु विकास के दुष्चक्र तथा खनिज सम्पदाओं के अन्धाधुंध दोहन के परिणामस्वरूप उसके समक्ष अस्तित्व का संकठ उठ खड़ा हुआ है और इनमें से कुछ ने हथियार उठा लिए हैं। यदि सन्तुलित विकास तथा आदिवासियों के पर्यावास में सामंजस्य स्थापित किया जाए तो कोई कारण नहीं कि यह समुदाय भी देश की प्रगति में अन्य लोगों की भांति कन्धे से कन्धा मिलाकर कार्य न करे। अन्त मंे मैं अरूणांचल प्रदेश की कोथुग बस्ती के आदिवासियों से बच्चे के अन्नप्राशन के अवसर पर गाए जाने वाले लोकगीत से अपनी बात समाप्त करता हूॅ-
अरे लुवांग लाम ताम ते
खुपोइ सो, फासांग सो
नुतुंग लाम ताम ते
वांगसा लाम ताम ते
नुतंग रो सो
वांगसा रो सो
हेंगोग लाथेंग टू
हेसांग लाथेंग टू
इसोंग इसे हेवाक जोक तोमियां
हे फेक डोत तोमियां
इथिंग तोंगसो
मोर काम मियों बाम्बा
अंसा तो दुंगो।
अर्थात तुम्हारा जन्म एक महान उद्देश्य के लिए हुआ है। तुम बड़े होकर अधिक से अधिक कृषि कार्य करो और अधिक अनाज उपजाओ। इससे तुम इतने अमीर हो जाओगे कि दूसरे गांव में जाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। तुम अफीम कभी मत खाना, हमेशा इससे परहेज करना।
सन्दर्भ सूत्रः-
1- डॉ. रमणिका गुप्ता, आदिवासी स्वर और नयी शताब्दी, पृ-10
2- रविकुमार गोंड (सपा) वर्तमान समय में आदिवासी समाज, पृ-118
3- रविकुमार गौंड एवं महेन्द्र प्रताप सिंह (संया.), समकालीन विमर्श मुद्दे और बहस में रविकुमार गौंड़ का लेख ”लोक जागरण और समकालीन हिन्दी कविता में आदिवासी अस्मिता“ पृ0 324-329
4- रमणिका गुप्ता, ”हादसे“ कहानी पृ0सं0-64
5- भिलाई वाणि, मई, जून 2012 अंक
6- ीपण्अपांेचमकपंण्पदध्ेवबपंस.ूमसंितमध्906928939ि3593म
93893691594क924940915930923
7- ीपण्उण्ूपापचमकपंण्वतहध्ूपापध्ःम्6ध्।4ः 86ः म्वः ।4ः 6ः म्नः ।4ः ठ 5ः
8- रविकुमार गोंड एवं महेन्द्र प्रताप सिंह (सपा) समकालीन विमर्श5 मुद्दे और बहस में महेन्द्र प्रताप सिंह का लेख ”भारत का आदिवासी समाज“ पंृ0 348-366 तथा डॉ. रमणिका गुप्त की पुस्तक ”आदिवासी विकास और विस्थापन“ में डॉ. बेलाराम धोगरा का लेख आजादी की स्वर्ण जयन्ती और आदिवासी पृ0 119-120
9- ीजजचरूध्ध्ूूूण्मनसीमतंसेनतअपअंसण्वतहध्चनइसपबमीवतेध्
बनसजनतंस . ेनतअपअंस . ुनंतजमतसलध्प्दकपंध्ंइवतपहपदंस . हतवनचे . प्दंपं
10- ीजजचरूध्ध्ूूूण्मनसीमतंसेनतअपअंसण्वतहध्चनइसपबमीवतेध्
बनसजनतंस . ेनतअपअंस . ुनंतजमतसलध्प्दकपंध्ंइवतपहपदंस . हतवनचे . प्दंपं
11- अरावली उद्घोष पत्रिका से उद्घृत निर्मला पुतुल की कविका ”तुम्हारे अहसान लेने से पहले सोचना पड़ेगा हमें, पृ0-93
12- संकल्प पत्रिका में प्रकाशित डॉ. भीम की कविता ”हम आदिवासी हैं“ पृ0-227
13- डॉ. रमणिका गुप्ता, आदिवासी स्वर और नयी शताब्दी में प्रकाशित बाहरू सोनवणे की कविता ”स्टेज“, पृ0-101
14- कविता कोश से उद्घृत अनुज लुगुन की कविता
15- हरिराम मीणा, सुबह के इंतज़ार में, पृ0-34
16- कविता कोश से उद्घृत अनुज लुगुन की कविता
17- आदिवासी साहित्य यात्रा (सपा-रमणिका गुप्ता) से उद्घृत विनायक तुमराम की कविता, पृ0-60
18- ूूूण्ीपदकपेंउंलण्बवउ   से उद्घृत
19- कविता कोश से उद्धृत अनुज लुगुन की कविता।
20- रविकुमार गोंड एवं महेन्द्र प्रताप सिंह (संपा) समकालीन विमर्शः मुद्दे और बहस में रमा आर्य का लेख ”अरूणांचल प्रदेश के आदिवासियों के लोकगीत, पंृ0-377

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