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किन्नर विमर्श : समाज के परित्यक्त वर्ग की व्यथा कथा

किन्नर विमर्श : समाज के परित्यक्त वर्ग की व्यथा कथा             डॉ पुनीत बिसारिया जब कभी किसी के परिवार में कोई खुशी का अवसर होता है, तो हम देखते हैं कि एक लैंगिक दृष्टि से विवादित समाज के लोग जो प्रायः हिजड़े (अथवा वर्तमान में प्रचलित नाम किन्नर; हालाँकि किन्नर शब्द हिमाचल प्रदेश के किन्नौर निवासियों हेतु प्रयुक्त होता था, जिसे अब हिजड़ों के सन्दर्भ में व्यवहृत किया जाने लगा है) होते हैं, आ जाते हैं और बधाइयाँ गाकर, आशीर्वाद देकर कुछ रुपए लेकर विदा हो जाते हैं. इसके बाद हम भी अपनी सामान्य गतिविधियों में व्यस्त हो जाते हैं और दोबारा कभी इनके बारे में नहीं सोचते. हम कभी यह जानने का प्रयास नहीं करते कि ये किन्नर कौन हैं, कहाँ से आये हैं, इनकी समस्याएँ क्या हैं और वे कौन से कारण हैं, जिनकी वजह से इन्हें किन्नर बनकर एक प्रकार की भिक्षावृत्ति से जीवन-यापन करने को विवश होना पड़ता है. किन्नरयाहिजड़ोंसेअभिप्रायउनलोगोंसेहै, जिनकेजननांगपूरीतरहविकसितनहोपाएहोंअथवापुरुषहोकरभीस्त्रैणस्वभावकेलोग, जिन्हेंपुरुषोंकीजगहस्त्रियोंकेबीचरहनेमेंसहजतामहसूसहोतीहै. वैसेहिजड़ोंकोचारवर्गोंमेंविभक्तकियाजासकताहै,- बुचरा, …