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हिन्दी सिनेमा में चित्रित नए सरोकार

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- पुनीत बिसारिया नयी शताब्दी का सिनेमा अपनी नवोन्मेषी दृष्टि, मौलिक संकल्पना और कुछ नये सवाल लेकर हमारे बीच उपस्थित है. नयी शताब्दी ने सिनेमा को नयी ऊर्जा, नये विषय, नये संस्कार दिये हैं. नयी सहस्राब्दि से पूर्व तक हिन्दी सिनेमा कुछ ख़ास किस्म के फॉर्मूलों तक केन्द्रित रहा करता था और वे फ़ॉर्मूले ही फिल्मों की सफलता की गारंटी हुआ करते थे, जैसे- प्रेम या रोमांस, जो कमोबेश आज भी किसी फिल्म को सफल बनाने की क्षमता रखता है अथवा नायक-खलनायक भिड़ंत या फिर प्रेम त्रिकोण या फिर भाइयों का आपसी प्यार, हिन्दू-मुस्लिम दोस्ती खोया-पाया या धार्मिक अथवा ऐतिहासिक विषय. इनसे हटकर जो विषय लिए जाते थे,  उन विषयों पर फ़िल्में बनाना जोखिम का काम माना जाता था और प्रायः फ़िल्मकार ऐसे जोखिम लेने से बचते थे. जो फिल्मकार ऐसे जोखिम ले लिया करते थे, उनकी फिल्मों को समान्तर सिनेमा या कलात्मक सिनेमा के सांचे में रखकर कुछ चुनिन्दा दर्शकों के लिए देखने को सीमित कर दिया जाता था. इसका नतीजा यह होता था कि बॉक्स ऑफिस या कमाई की दृष्टि से ये फ़िल्में ज्यादातर घाटे का सौदा साबित होती थीं और इन्हें आम जनता के लिए अनुपयोगी घ…