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Showing posts from August 15, 2016

स्वतंत्रता दिवस की 70वीं वर्षगांठ

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स्वतंत्रता दिवस की 70वीं वर्षगांठ पर पेश हैं हिन्दी सिनेमा के ऐसे अमर गीत, जिनसे हम सब किसी न किसी क्षण पर आंदोलित होते रहे हैं. स्वाधीनता संग्राम के शहीदों को नमन करते हुए पेश हैं ये गीत-
1- आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है
2- आओ बच्चों तुम्हें दिखाएँ झांकी हिंदुस्तान की
3- मेरे देश की धरती
4-हर करम अपना करेंगे
5- नन्हा मुन्ना राही हूँ
6- छोड़ो कल की बातें
7- इन्साफ की डगर पर
8- दे दी हमे आजादी बिना
9- ऐ वतन ऐ वतन
10- मेरा रंग दे बसंती चोला
11- आरम्भ है प्रचंड बोल
12- नन्हें मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी मैं क्या है
13- भारत हमको जान से प्यारा है
14- अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों
15- है प्रीत जहाँ की रीत सदा
16- जिस देश में गंगा बहती है
17- कदम कदम बढाये जा
18- जहाँ डाल डाल पर सोने
19- ऐ मेरे प्यारे वतन
20- जय जननी ने भारत माँ
21- आई लव माय इंडिया
22- ऐसा देश है मेरा
23- अपनी आजादी को हम हर्गिज़ मिटा सकते नही
24- हम लाये हैं तूफ़ान से कश्ती निकाल के
25- सरफरोशी की तमन्ना
26- कन्धों से मिलते है कंधे
27- यह देश है वीर जवानों का
28- मेरे दुश्मन मेरे भाई
29- यह जो देश है मेरा
30- बढ़ते चलो, बढ़ते चलो, बढ़ते चलो जव…

बकवास फिल्म है मोहेन जोदारो

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र कड़ी हैं, जिनके सपाट अभिनय ने फिल्म को भारी नुकसान पहुँचाया है. ऋतिक रोशन का दमदार अभिनय इस फिल्म को उठाने का प्रयास करता है लेकिन अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता.
इस फिल्म के कुछ सकारात्मक पक्ष भी हैं, जैसे सिन्धु घाटी की सभ्यता को उसके उत्खनित स्वरुप में दिखाना और वस्त्र विन्यास तथा सामाजिक जीवन की परख करना, जिसमें आशुतोष की प्रतिभा का चरम दीखता है, लेकिन गीत-संगीत, संवाद और 'कदाचित' सांस्कृतिक पक्ष के अंकन की दुर्बलता ने एक बेहद शानदार विषय को पूरी तरह से धर्मेन्द्र की धरमवीर मार्का या फिर अमरीशपुरी की टिपिकल खलनायकत्व वाली फिल्म में बदल डाला है. अगर आशुतोष सही पात्र चयन और पटकथा एवंगीत-संगीत पर ध्यान दे देते तथा बड़े नामों का मोह छोडकर किसी अन्य गीतकार और संगीतकार को अवसर देते तो शायद बेहतर नतीजे आ सकते थे. मैं व्यक्तिगत तौर पर इस फिल्म से काफी निराश हुआ हूँ. मेरी ओर से इस फिल्म को 5 में सिर्फ दो स्टार.