नॉर्मन बेट्स की माँ बनाम माँ का नार्मन बेट्स

नॉर्मन बेट्स की माँ बनाम माँ का नार्मन बेट्स
डॉ. पुनीत बिसारिया*
सम्पूर्ण विश्व में माँ को अत्यंत आदर दिया जाता है और जननी होने के कारण वह सम्माननीया और प्रेरणा का स्रोत मानी जाती है परन्तु यही स्नेह और वात्सल्य जब एक माँ द्वारा अपने पुत्र को अत्यधिक कठोर नियंत्रण में रखने और उसका स्वाभाविक किशोरगत एवं पुरुषोचित विकास न होने देने की हद तक पहुँच जाता है तो यह स्नेह और वात्सल्य नहीं रह जाता, वरन एक व्यक्ति को ‘बहुव्यक्तित्व असमानता’ या ‘मल्टीपर्सनालिटी डिसआर्डर’ अथवा ‘डिसोसिएटिव आइडेंटिटी डिसआर्डर’ रोग का शिकार बना देता है और इस रोग से ग्रसित होकर वह व्यक्ति अपनी पहचान, अपनी अस्मिता, अपनी इयत्ता और अपने व्यवहार को माँ की पहचान, अस्मिता, इयत्ता और व्यवहार से इस तरह अविभाज्य ढंग से जोड़ देता है कि उसके अंतर्मन में बार-बार माँ ही दस्तक देती रहती है और माँ की मृत्यु के बाद भी वर्षों तक वह माँ की मृत देह को घर में रखकर उससे ही आदेश और प्रेरणा लेता रहता है | इतना इस हद तक होता है कि वह माँ के साथ दूसरे पुरुष की यौनिक उपस्थिति को भी बर्दाश्त नहीं कर पाता और माँ तथा उसके प्रेमी को जहर देकर मार देता है |
 रॉबर्ट ब्लॉच ने ‘साइको’ उपन्यास में नॉर्मन बेट्स के रूप में बहुव्यक्तित्व असमानता से ग्रस्त एक ऐसे मानसिक रोगी को अपनी कथा के ताने-बाने के केन्द्र में रखा है, जो एक शरीर में रहते हुए तीन व्यक्तित्वों का जीवन जीता है - एक चालीस वर्षीय अधेड़ के रूप में खुद का वास्तविक जीवन, अपनी माँ के जैसी औरत का जीवन और छोटे से बच्चे के रूप में माँ के आज्ञाकारी पुत्र का जीवन |  चिकित्सा विज्ञान इसे एक मानसिक रोग की संज्ञा देता है और ऐसे रोगी की पहचान एक ऐसे व्यक्ति के रूप में करता है, जिसे  बचपन से अत्यधिक कठोर अनुशासन में रखा गया हो और उसे स्वयं का व्यक्तित्व निर्मित करने से रोका गया हो, या उसे बचपन में कोई चोट लगी हो या फिर किसी मानसिक आघात के कारण उसका मस्तिष्क स्वयं के व्यक्तित्व के अलावा किसी अन्य व्यक्ति अथवा व्यक्तियों के व्यक्तित्व का भी अनुसरण करने लगता है|  
आइये, अब नार्मन बेट्स की माँ नारमा यानि मिसेज़ बेट्स के व्यक्तित्व पर दृष्टि डालते हैं | लेखक ने मिसेज़ बेट्स के व्यक्तित्व को  इस प्रकार गढ़ा है कि उसके चरित्र में विरुद्धों का सामंजस्य दृष्टिगत होता है | विवाह के कुछ दिनों के पश्चात् ही उसका पति उसे ‘छोड़कर भाग गया’ था और उसका एकमात्र पुत्र नार्मन बेट्स ही उसके साथ था | ऐसे में उसका पुरुष जाति से मोहभंग हो गया था और वह हर पुरुष से घृणा करने लगी थी लेकिन चूंकि उसका इकलौता पुत्र भी पुरुष ही था, इसलिए उसने इस बात का भरसक प्रयास किया कि उसका पुत्र कभी भी पुरुष न बन सके| इसके लिये उसने  अपने बेटे को इतने कड़े अनुशासन में रखा कि वह ‘जनाना मर्द’ के रूप में विकसित हुआ जो माँ का छोकरा बनकर ही रह गया किन्तु उस महिला को एक महिला के रूप में एक पुरुष की शारीरिक आवश्यकता थी, जिसके लिए 39 वर्ष की आयु में वह मिस्टर कौन्सीडाइन  की तरफ आकृष्ट होती है | एक माँ के रूप में वह अपने पुत्र पर पूरा प्यार तो उड़ेलती है बल्कि यही नहीं, उसका व्यक्तित्व उसके पुत्र पर इतना अधिक हावी हो जाता है कि वह अपनी माँ जैसी औरतबनने का प्रयास करने लगता है | लेकिन जब नार्मन यह देखता है कि जिस माँ के जैसा वह बनने के ख्वाब देखता है, वही उसे छोड़कर दूसरे पुरुष मिस्टर कौन्सीडाइन  की बांहों में अंतरंगता के पल जी रही है तो जाने-अनजाने उसके पुरुषत्व पर ठेस लगती है और वह उन दोनों को काफी में जहर मिलाकर उनकी हत्या कर देता है | फिर भी माँ का व्यक्तित्व नार्मन पर कुछ इस तरह हावी रहता है कि माँ की अनुपस्थिति को वह अधिक समय तक सहन नहीं कर पाता और माँ की लाश को कब्र से निकालकर उससे अदृश्य रूप में या जादू-टोने के नाम पर प्रेरणा, शक्ति या आदेश रहता है | इस प्रकार माँ का व्यक्तित्व उसके जीते जी और मरने के बाद भी नार्मन के दिलोदिमाग पर तारी रहता है | कथा की शुरूआत से लेकर अंत तक माँ का अस्तित्व प्रत्यक्षतः या अनुभूत रूप में उपस्थित रहता है | यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि माँ पुत्र को पुरुष बनने से रोकने का भरसक प्रयास करती है और स्त्रियों  से भी दूर रखने का प्रयास करती है | यह बात बालक नार्मन के अंतर्मन में इस कदर पैबस्त हो जाती है कि वह अपने होटल में ठहरी मैरी को स्नानागार में नग्न देखने के बाद अपराधबोध से ग्रस्त होकर अदृश्यतः उपस्थित माँ की प्रेरणा लेकर मैरी की हत्या कर देता है | हालांकि यहाँ लेखक यह स्पष्ट नहीं करता कि नायक ने किसकी प्रेरणा से गिलहरी को मारकर उसमें भूसा भरकर रखा था |
इस प्रकार यह स्पष्ट है कि माँ की कथा के विकासक्रम में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका है | लेखक ने मनोवैज्ञानिक दृष्टि से मातृ-पुत्र संबंधों की अत्यधिक गहराई से पड़ताल की है और यही निष्कर्ष निकाला है कि माँ को अपने पुत्र के साथ शिशुकाल से प्रारंभ हुए सम्बन्ध को एक उम्र के बाद स्वतंत्र रूप से पुष्पित -पल्लवित होने का अवसर देना चाहिए वरना ये मधुर और वात्सल्यपूर्ण सम्बन्ध आगे चलकर एक रोग की आहट भी ला सकते हैं | यदि इस उपन्यास के नजरिये से माँ और पुत्र के संबंधों का विश्लेषण करें तो पाते हैं कि एक माँ ने अपनी ममता और कठोर अनुशासन को अपने पुत्र पर इस क़दर हावी कर दिया कि इसने पुत्र के मनोमस्तिष्क को पूर्णतः आच्छादित कर दिया, जिसका परिणाम माँ की मौत और पुत्र के मानसिक अपराधी के रूप में सामने आया |
यदि हम इस प्रश्न पर विचार करें कि माँ अर्थात मिसेज़ बेट्स ने अपने पुत्र को कठोर अनुशासन में क्यों रखा और उसे स्त्रियों से दूर रखने का भरसक प्रयत्न क्यों किया तो इसका उत्तर भी हमें मनोविज्ञान में जाकर प्राप्त करने का प्रयास करना होगा| मनोवैज्ञानिक सुश्री बेरिट ब्रोगार्ड ने नार्सिसिस्टिक पुरुषों तथा उनकी माताओं पर लम्बे समय तक अनुसन्धान करने के पश्चात् यह निष्कर्ष निकाला है कि एक स्वार्थी माँ का पुत्र उसकी पुत्री की तुलना में उस माँ से कहीं अधिक प्रभाव ग्रहण करता है और अपनी माँ के गुणों-अवगुणों को जीवन में उतारने का अपेक्षाकृत अधिक प्रयास करता है | माइकल गुरियन शम्भाला अपनी पुस्तक ‘द इनविज़िबल प्रेज़ेंस’ में ऐसे पुरुषों का अध्ययन करते हैं, जिन्हें अपने पिता से उपेक्षा मिली हो उन पर माँ का अत्यधिक कठोर नियंत्रण रहा हो और इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि पुरुषोचित विकास के लिए लालन-पालन में पिता के योगदान की भी उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए क्योंकि ऐसा करने से पुरुष के पुरुषोचित विकास में बाधा आती है और वह जनाना मर्द बन सकता है जैसा कि नार्मन बेट्स के मामले में हुआ| ऐसे बालकों को ‘स्त्रीत्व’ तथा ‘पुरुषत्व’ में सामंजस्य बनाने में काफी दिक्कतें आती हैं और वे अपने व्यक्तित्व में पुरुषत्व के गुण उभार पाने में दिक्कतों का अनुभव करते हैं | डॉ कीथ गेनर कहती हैं कि यदि कोई माँ अपने बेटे की हर बात का ध्यान रखती है और उसे स्वावलम्बी नहीं बनने देती तो इस बात की पूरी आशंका है कि यह पुत्र आगे चलकर पूरे जीवन में दूसरे के ऊपर आश्रित रहेगा, चाहे वह उसकी माँ हो या जीवनसाथी | इसे मनोवैज्ञानिक एलिन क़ुइन्लैन ‘एसमदरहुड’ नाम देते हैं, जो किसी व्यक्ति के मानसिक विकास के लिए नकारात्मक है |
अब मिसेज़ बेट्स के व्यक्तित्व तथा उसके जीवन चक्र की ओर दृष्टि डालते हैं | एक ऐसी महिला, जिसे उसका पति एक बेटा देने के बाद छोड़कर चला गया था, वह भी शायद इसलिए क्योंकि वह सुन्दर नहीं थी और ज़रूरत से ज्यादा ही दुबली-पतली थी लेकिन चूँकि कानूनन मिसेज़ बेट्स उसकी पत्नी थी, इसलिए उसकी सारी संपत्ति मिसेज़ बेट्स को ही मिल गई | लेकिन इस घटना का मिसेज़ बेट्स के मस्तिष्क पर इतना गहरा और घातक प्रभाव पड़ा कि अपने अवचेतन में पुरुष को शत्रु मानकर पुत्र के साथ भी जाने-अनजाने शत्रुवत व्यवहार ही करने लगी लेकिन चूंकि उसका लालन-पालन सामान्य परिवार में हुआ था, इसलिए वह तो इस ग्रन्थि से बाहर निकल आयी, परन्तु उसका पुत्र नार्मन ‘नॉर्मल’ नहीं बन सका और वह स्त्रियों को माँ की नसीहत मानकर कि सब लड़कियाँ कुतियाँ होती हैं, (वह कुछ हद तक पुरुषों से भी, क्योंकि माँ का पुरुषद्रोही व्यक्तित्व भी उस पर तारी था) लड़कियों से दूर रहने की माँ की प्रेरणा को आदेश मानता रहा और आम जन से कटे रहकर माँ की मृत देह के साथ जीने को ही अपनी नियति मान बैठा | लेकिन यह कैसी माँ है, जिसने खुद ओढ़े हुए पुरुषविरोधी दृष्टिकोण का तो त्याग कर दिया किन्तु पुत्र को अपने आदेश की जंजीरों से बांधे रखकर खुश होती रही | परिणामस्वरूप उसे ‘नॉर्मन’, ‘नारमा’ और ‘नॉर्मल’ ये तीन ज़िंदगियाँ जीने को अभिशप्त होना पड़ा | माँ अर्थात नारमा का अपने पति से अलगाव पति-पत्नी के असहज संबंधों पर भी महत्त्वपूर्ण टिप्पणी है लेकिन लेखक ने इस पक्ष को न उभारकर संकेतों से ही इन सम्बन्धों को व्याख्यायित कर दिया है | हालाँकि मेरा मानना है कि यदि रॉबर्ट ब्लॉच ने इस पक्ष पर भी इस उपन्यास में मनोवैज्ञानिक ढंग से विचार किया होता तो नारमा के व्यक्तित्व की कलुषता को काफी हद तक धोया जा सकता था और यह उपन्यास और अधिक प्रभावशाली बन सकता था | इससे उन प्रश्नों के भी उत्तर मिल सकते थे, जिनसे नॉर्मन का साबका एक बार उस समय हुआ था, जब वह बच्चा था और दूसरी बार उस समय जब वह मैरी की हत्या के बाद उस हत्या के समर्थन में माँ की सीख को याद कर रहा था | ये प्रश्न थे- चुड़ैल किसे कहते हैं?, बुराई क्या होती है?, पाप क्या होता है?, भूत-चुड़ैलों को अपना जीवन जीने में कौन सा मज़ा आता है?  क्योंकि शायद नारमा अदृष्टित सौतन में ही संभवतः चुड़ैल और कुतिया का रूप देख रही थी क्योंकि उसी के अनुसार ‘कुतियाँ आदमी को फुसलाकर पाप करने को मजबूर करती हैं’| इससे माँ की वह घटना भी “जस्टिफाई” की जा सकती थी कि पुत्र को नंगे होकर शीशे को निहारते देखकर क्यों माँ ने उस पर चाँदी की मूठ वाला सफाई का ब्रश उसके सिर पर दे मारा था | और यह भी संभावना हो सकती है कि इस चोट के कारण ही नॉर्मन मानसिक रोगी बना हो लेकिन ये संकेत लेखक पाठकों के बीच रखकर उन्हें अपने निष्कर्ष निकालने को स्वतन्त्र छोड़ देता है | लेखक यह तो बताता है कि नॉर्मन ‘शीज़ोफ्रेनिया’ से ‘न्यूरोसिस’ रोग की ओर बढ़ रहा था | शीज़ोफ्रेनिया का रोगी यथार्थ और स्वप्न में अंतर नहीं कर पाता, दिग्भ्रमित रहता है और समाज से कटकर उन आवाज़ों को सुनता है जो अन्य लोग नहीं सुन पाते लेकिन ऐसे रोगी को चिकित्सा से ठीक किया जा सकता है परन्तु शायद उचित उपचार न मिलने से नायक का यह रोग बढ़कर न्यूरोसिस में परिवर्तित हो गया होगा, जिसमें रोगी का उन्मादी हो जाना, किसी से भयभीत होना, डिप्रेशन में चला जाना, अपनी पहचान समझ पाने में अक्षम होना, मन में बुरे ख्याल आना, बार-बार क्रोधित होना, अकेले रहना पसंद करना जैसे लक्षण देखे जाते हैं, परन्तु वह यह नहीं बताता कि नॉर्मन ‘न्यूरोसिस’ से ‘ मल्टीपर्सनालिटी डिसआर्डर’ की दिशा में किस प्रकार प्रवृत्त हुआ होगा | शायद माँ के जाने के बाद लगे आघात से या फिर माँ के व्यक्तित्व की दिन-प्रतिदिन उस पर गहरी होती छायाओं से | कौन जाने, सच क्या है लेकिन इतना तो सच है ही कि अमेरिकी उपन्यासकार रॉबर्ट ब्लॉच एक बड़ा लेखक होने के साथ-साथ एक बहुत बड़ा मनोवैज्ञानिक भी रहा होगा क्योंकि एक मनोवैज्ञानिक ही एक मानसिक रोगी के रोग की विविध दिशाओं तथा यह रोग बढ़कर किस तरह भयावह रूप ले सकता है, उसका सफलतापूर्वक चित्रांकन कर सकता है | हालांकि माना जाता है कि इस उपन्यास के प्रथम बार प्रकाशित होने के वर्ष 1959 से दो वर्ष पूर्व सन 1957 में अमेरिका के विस्कोंसिन से एड गेन नामक एक अपराधी को दो महिलाओं की हत्या के जुर्म में गिरफ्तार किया गया था और उसके घर की तलाशी लेने पर वहां से इंसानी चमड़े और अंगों से से बने कपड़े, बर्तन, फर्नीचर आदि बरामद हुए थे | उस अपराधी का परीक्षण करने के बाद मनोवैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुँचे थे कि वह इंसानी खाल और अंगों से महिलाओं का परिधान बना रहा था ताकि इसे पहनकर वह अपनी मृत माँ का भेस धर सके क्योंकि उसकी माँ बाल्यकाल से उस पर कठोर नियंत्रण रखती थी और वह अपनी माँ जैसा बनना चाहता था | हालांकि जिस समय गेन को गिरफ्तार किया गया, उस समय ब्लॉच वहाँ से लगभग 56 किलोमीटर दूर रह रहे थे लेकिन उन्हें इस घटना का पता उस समय लग पाया जब वह इस उपन्यास को लगभग खत्म कर चुके थे | यह भी इस उपन्यास से जुदा एक आश्चर्यजनक पहलू है कि जिस समय लेखक यह उपन्यास लिख रहा था, लगभग उसी समय उससे ५६ किलोमीटर की दूरी पर ही लगभग ऐसी ही घटना वास्तव में घटित हो रही थी | शायद इन सबके कारण ही पीटर स्ट्रोब ने रॉबर्ट ब्लॉच को ‘ आल टाइम मास्टर्स में से एक’ की संज्ञा दी थी |
रॉबर्ट ब्लॉच के कालजयी उपन्यास ‘साइको’ के प्रकाशन के लगभग 12 वर्ष बाद इसी नाम से हिन्दी में इसका रूपान्तर प्रकाशित हुआ था | इसका अनुवाद ए टी ज़ाकिर ने किया था | यह अनुवाद इतना सहज और यथातथ्य है कि इसे पढ़ने के पश्चात् ऐसा प्रतीत होता है कि यह अनूदित न होकर मूल पाठ हो | किसी भी अनुवादक की सफलता इसी में है कि उसका ‘स्वत्व’ अनुवाद में न दिखे | कहने की आवश्यकता नहीं, कि ज़ाकिर जी इस कसौटी पर पूर्णतः खरे उतरे हैं | अनेक वर्षों के अन्तराल के बाद इस उपन्यास के हिन्दी रूपान्तर का दूसरा संस्करण प्रकाशित होने जा रहा है | इस अवसर पर मैं इस उपन्यास के लेखक रॉबर्ट ब्लॉच को अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करता हूँ और अनुवादक तथा प्रकाशक महोदय को बधाई देते हुए इस पुस्तक के पुनः हिन्दी पाठकों के बीच लोकप्रिय होने की कामना करता हूँ |  


·         एसोसिएट प्रोफ़ेसर –हिन्दी विभाग, बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी, उत्तर प्रदेश 

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